Kharsawa Golikand - 1st January 1948 | आदिवासियों के लिए काला दिन | Sanjeev Vlog
Автор: Dxfire Production
Загружено: 2023-02-01
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Kharsawa Golikand - 1st January 1948 | आदिवासियों के लिए काला दिन | Sanjeev Vlog | Dxfire Production
History
आज़ादी के बाद रियासतों के एकीकरण के समय सरायकेला और खरसावां के आदिवासी ओडिशा में विलय के ख़िलाफ़ थे. अपने लिए अलग राज्य 'झारखंड' की मांग कर रहे आदिवासी 1 जनवरी 1948 को औपचारिक तौर पर सत्ता हस्तांतरण के तय दिन खरसावां बाज़ार मैदान में एकत्र हुए थे, जहां उन पर तत्कालीन ओडिशा प्रशासन ने बिना चेतावनी गोलीबारी करवाई थी. दावा है कि इसमें हज़ारों आदिवासियों की जान गई थी.
आदिवासी समाज में स्वशासन की परंपरा रही हैं लेकिन खरसावां और सरायकेला क्षेत्र में 17वीं सदी के मध्य में दिकुओं ने आदिवासी बाहुल्य इलाकों में धोखाधड़ी करके अपने रजवाड़े स्थापित कर लिए और जमीनों एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों के मालिक-राजा बन बैठे. अंग्रेजी हुकूमत के दौर में इन्होंने अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार कर ली. हालांकि आदिवासी समाज का प्रातिरोध (तिलका माझी का विद्रोह) इन इलाकों में दिकुओं के प्रवेश के साथ ही शुरू हो गया था.आजादी की घोषणा और स्वतंत्रता अधिनियम 1947 (भाग-7 सी) के अनुसार, आदिवासी इलाकों में रियासतोंं के अधिकार समाप्त हो गए थे और देश के एकीकरण और रियासतों के विलय की प्रक्रिया आरंभ हो गई. खरसावां नरसंहार की पृष्ठभूमि यही है.
देश के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने देशी रियासतों को मिलाकर देश के एकीकरण की प्रक्रिया शुरू की. तमाम रियासतोंं को 3 श्रेणियों अ- बड़ी रियासतें, बी- मध्यम और सी श्रेणी में छोटी रियासतोंं को बांटा गया. खरसावां और सरायकेला छोटी रियासत थीं.एकीकरण और रियासतोंं के विलय की प्रक्रिया में खरसावां, सरायकेला रियासत प्रमुखों ने ओडिशा के साथ अपने विलय को मंजूरी दे दी थी और 1 जनवरी 1948 को औपचारिक तौर पर सत्ता हस्तांतरण के दिन के रूप में निर्धारित किया गया था. लेकिन हो, भूमिज, मुंडा, संथाल और अन्य आदिवासी इस विलय के खिलाफ थे. वे अपने लिए एक अलग आदिवासी बाहुल्य राज्य- झारखंड की मांग कर रहे थे.25 दिसंबर 1947 को चंद्रपुर-जोजोडीह में नदी किनारे आयोजित सभा रियासतों के विलय के खिलाफ आदिवासियों बाहुल्य क्षेत्रों को मिलाकर आदिवासी राज्य की मांग पर आदिवासियों को एकजुट करने और 1 जनवरी को साप्ताहिक हाट के दिन खरसावां बाजार मैदान में सभा करने का फैसला किया गया, जहां मरंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के द्वारा संबोधित किया जाना तय हुआ.संविधान सभा के सदस्य, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और आदिवासी महासभा के प्रमुख जयपाल सिंह मुंडा के आगमन की सूचना आदिवासियों के मध्य जैसे ही पहुंची, उन्हें सुनने-देखने के लिए रांची, चक्रधरपुर, चाईबासा, करंडीह, परसुडीह, तमाड़, वुंडू, जमशेदपुर, खरसावां, सरायकेला के स्थानीय आदिवासी बच्चे, बूढ़े, नौजवान, औरत, मर्द सभी कई दिनों की तैयारी के साथ सिर पर गठरी, खाने-पीने के सामान और परंपरागत हथियारों- कुल्हाड़ी, तीर धनुष, ढोल नगाड़े से लैस होकर पैदल ही सभा स्थल की ओर चल पड़े.गुरुवार साप्ताहिक हाट का दिन होने के चलते सामान्य से अधिक लोग बाजार के मैदान और उसके आसपास मौजूद थे. सभा के लिए लोगों का आना जारी था. आजादी के गीत, आदिवासी एकता के नारे, अलग राज्य- जय झारखंड की मांग, रियासतोंं के विलय के निर्णय और ओडिशा मुख्यमंत्री के खिलाफ नारे लगाये जा रहे थे. 50,000 से अधिक लोगों के सभा स्थल पर पहुंचने से ये अंदाजा हो गया था कि रियासतोंं के विलय के निर्णय ने पूरा आदिवासी बाहुल्य इलाके को सुलगा दिया था.ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय पाणी किसी भी तरह के विरोध को बलपूर्वक कुचलने के लिए पहले से ही तैयार थे, लिहाजा उन्होंने पूर्व में ही अपनी तैयारी कर ली थी. ओडिशा सशस्त्र सुरक्षा बल और पुलिस के जवानों को सभा के आयोजन से 2 हफ्ते पहले 18 दिसंबर 1947 को जंगल के रास्ते खरसावां भेज दिया गया था. इनमें 3 हथियारबंद कंपनी शामिल थीं जिन्हें खरसावां के स्कूल में ठहराया गया था.'झारखंड आबुव: ओडिशा जरी कबुव: रोटी पकौड़ी तेल में, विजय पाणी जेल में' का नारा आसमान में गूंजने लगा. जुलूस की लंबी-लंबी कतारें चलने लगी, जुलूस दोपहर बाद हाट मैदान में जाकर सभा में तब्दील हो गया.आदिवासी महासभा के नेताओं ने दूर-दराज से आए आदिवासियों को संबोधित किया. लेकिन मरंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा खरसावां की सभा में शामिल नहीं हो सके. आदिवासियों का एक जत्था खरसावां के तत्कालीन राजा से मिलना चाहता था ताकि विलय निर्णय पर पुनर्विचार का अनुरोध किया जा सके लेकिन संभव नहीं हुआ.सभा के समाप्त होने के कुछ ही देर बाद अचानक बिना किसी चेतावनी के ओडिशा सरकार के आदेश पर आधुनिक हथियारों से लैस ओडिशा सुरक्षा बल और पुलिस ने आदिवासियों पर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी.लोग जान बचाने के लिए इधर से उधर भागने लगे, कुछ जमीन पर लेट गए, कुछ मैदान में बने कुएं में कूद गए, कुछ भगदड़ में मारे गए. इनमें बच्चे, बुजुर्ग और महिलाओं की तादाद सबसे अधिक थी. पूरा मैदान लाशों से पट गया था और अब मैदान को ओडिशा मिलिट्री और पुलिस ने चारों तरफ से घेर लिया.घायलों को न तो मैदान से बाहर जाने दिया गया और न इलाज के लिए अस्पताल ले लाया गया. सेना और पुलिस के जवानों ने लाशों को ट्रकों में भरकर सारंडा के जंगलो में फेंक दिया. मैदान स्थित लाशों से भरे कुएं को रात में ही स्थायी रूप से बंद कर दिया गया. भारत सरकार ने भी अपनी और से कोई जांच नही बैठाई.ओडिशा सरकार ने आदिवासियों के इस नरसंहार को छुपाने के लिए पत्रकारों के घटनास्थल पर जाने से प्रतिबंध लगा दिया.आजादी के मात्र 133 दिन बाद ही खरसावां में कर्फ्यू लगा दिया गया.
Song Credit
"Scott Buckley - Snowfall" is under a Creative Commons license Attribution 3.0 Unported (CC BY 3.0) https://creativecommons.org/licenses/...
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