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#history

Автор: Nisha itihaas Gangotri

Загружено: 2025-11-23

Просмотров: 108

Описание: #educación ,#bharatkaitihas ,#indianhistory ,#historylovers ,#likeandsubscribe पाली भाषा की उत्पत्ति और विकास —

पाली भाषा प्राचीन भारत की एक महत्वपूर्ण मध्य-भारतीय आर्य भाषा है, जिसका संबंध बौद्ध धर्म के उदय और प्रसार से अत्यंत गहरा है। पाली भाषा मुख्यतः बौद्ध धर्म के थेरवादी संप्रदाय की धार्मिक, आध्यात्मिक तथा दार्शनिक रचनाओं की भाषा के रूप में प्रसिद्ध है। पाली में रचित “त्रिपिटक” बौद्ध साहित्य का सबसे प्रामाणिक और विशाल ग्रंथ-समूह माना जाता है, जिसने इस भाषा को ऐतिहासिक महत्व प्रदान किया।

पाली भाषा की उत्पत्ति
पाली भाषा का विकास प्राकृत भाषा-परिवार की एक शाखा से हुआ माना जाता है। अधिकांश विद्वानों के अनुसार यह ‘माघधी प्राकृत’ के अत्यंत निकट है, जो उस समय मगध क्षेत्र (वर्तमान बिहार) में बोली जाती थी। बुद्ध द्वारा अपने उपदेश साधारण जनसमुदाय को समझाने के लिए स्थानीय बोलियों का प्रयोग किया गया, जिससे पाली भाषा का रूप और महत्व बढ़ा। इसलिए पाली को ‘जनभाषा’ अथवा ‘लोकभाषा’ भी कहा जाता है।

पाली शब्द का अर्थ भी ‘पंक्ति’ या ‘सूत्र’ से है, जो यह संकेत करता है कि यह भाषा उन ग्रंथों की भाषा थी जिन्हें पंक्तिबद्ध रूप में संकलित किया गया। पाली भाषा किसी एक क्षेत्र की बोली न होकर विभिन्न बोलियों का मिश्रित रूप थी, जिसे बौद्ध भिक्षुओं ने मानकीकृत किया।

पाली भाषा का विकास
पाली भाषा का विकास बौद्ध समुदाय के विस्तार के साथ-साथ हुआ। प्रारंभिक चरण में यह केवल उपदेशों और शिक्षाओं की मौखिक परंपरा में प्रयुक्त होती थी। बाद में इन उपदेशों को संकलित कर ‘विनय पिटक’, ‘सुत्त पिटक’ और ‘अभिधम्म पिटक’ रूप में लिखा गया। त्रिपिटक के संरक्षण ने पाली भाषा को साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान की।

मौर्य काल, विशेषकर अशोक के शासन में, पाली भाषा को विशेष महत्व मिला। बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ यह भाषा श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, लाओस और कंबोडिया तक पहुँची। इन क्षेत्रों में पाली भाषा धार्मिक अनुष्ठानों और शिक्षा की प्रमुख भाषा बनी।

समय के साथ जब संस्कृत और अपभ्रंश का प्रभाव बढ़ा, तब पाली भाषा की सक्रियता कम होती गई, किंतु थेरवाद बौद्ध परंपरा में इसका उपयोग निरंतर जारी रहा। आज भी पाली भाषा बौद्ध अध्ययन, प्राचीन इतिहास, भाषा-विज्ञान और साहित्य के शोध कार्यों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

निष्कर्ष
संक्षेप में, पाली भाषा एक प्राचीन मध्य-भारतीय भाषा है, जिसकी उत्पत्ति प्राकृत भाषाओं से हुई और जिसने बौद्ध धर्मग्रंथों को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके विकास में बौद्ध भिक्षुओं, मौर्य शासन और दक्षिण-पूर्व एशिया में बौद्ध धर्म के प्रसार का बड़ा योगदान है। आज भी यह भाषा धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अध्ययन के लिए अविस्मरणीय है।

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