न मैं न मेरा || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2023)
Автор: आचार्य प्रशान्त - Acharya Prashant
Загружено: 2024-09-24
Просмотров: 1153582
Описание:
🧔🏻♂️ आचार्य प्रशांत गीता पढ़ा रहे हैं। घर बैठे लाइव सत्रों से जुड़ें, अभी फॉर्म भरें — https://acharyaprashant.org/hi/enquir...
📚 आचार्य प्रशांत की पुस्तकें पढ़ना चाहते हैं?
फ्री डिलीवरी पाएँ: https://acharyaprashant.org/hi/books?...
📲 आचार्य प्रशांत की मोबाइल ऐप डाउनलोड करें:
Android: https://play.google.com/store/apps/de...
iOS: https://apps.apple.com/in/app/acharya...
📝 चुनिंदा बोध लेख पढ़ें, खास आपके लिए: https://acharyaprashant.org/en/articl...
➖➖➖➖➖➖
#acharyaprashant #motivation #selfimprovement #inspiration #selfdiscovery
वीडियो जानकारी: 05.10.23, अष्टावक्र गीता, ग्रेटर नॉएडा
न मैं न मेरा || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2023)
📋 Video Chapters:
0:00 - Intro
0:01 - "जीवन का ऑडिट: कहाँ आ गए हम?"
1:00 - भीतर और बाहर का संघर्ष
4:18 - आधुनिक जीवन की त्रासदी: विकल्पों का अभिशाप
6:04 - आत्महत्याओं का बढ़ता ग्राफ: क्यों?
9:57 - सुकरात की सीख
16:08 - निष्पक्ष निरीक्षण का पुरस्कार
25:40 - स्वयं के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना
30:10 - उपनिषद का सूत्र: दूरी और निकटता
36:47 - निरीक्षण और परीक्षण का महत्व
37:59 - समापन
विवरण:
इस वीडियो में आचार्य जी ने आत्म निरीक्षण और आंतरिक संघर्ष के महत्व पर जोर दिया है। उन्होंने बताया कि आधुनिक मनुष्य बाहरी दुनिया में भले ही सफल हो, लेकिन भीतर की विक्षिप्तता और मानसिक तनाव से जूझ रहा है। आचार्य जी ने कहा कि हम कभी अपने जीवन का ऑडिट नहीं करते, जिससे हमें यह समझने में कठिनाई होती है कि हमने क्या पाया और क्या खोया। उन्होंने उदाहरण दिया कि जो चीजें हमारे लिए आवश्यक नहीं हैं, वे भी हमें आवश्यक लगती हैं, क्योंकि हम उनका सही मूल्यांकन नहीं करते।
आचार्य जी ने यह भी बताया कि आत्म निरीक्षण के बिना हम अपने अनुभवों को सही तरीके से नहीं समझ सकते। उन्होंने सुकरात के विचारों का उल्लेख किया, जिन्होंने ज्ञान और अनुभव के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। आचार्य जी ने कहा कि सही निरीक्षण और परीक्षण के बिना, हम अपने जीवन में सही निर्णय नहीं ले सकते। अंत में, उन्होंने बताया कि जब हम भीतर से स्थिर हो जाते हैं, तब ही हम बाहरी दुनिया में सही तरीके से कार्य कर सकते हैं।
प्रसंग:
~ क्यों हम कहीं भी पूरे नहीं हो पाते?
~ आंतरिक श्रम क्या है? और ये श्रम पुराने आदमी के शारीरिक श्रम से कहीं ज्यादा दुखदाई क्यों है?
~ हम बिना बाजू हिलाए भी क्यों बुरी तरह थके हुए रहते हैं?
~ आधुनिक आदमी की त्रासदी क्या है?
~ सच्चा जीवन कौन सा है?
~ कौन हजारों मील की यात्रा कर सकता है?
~ परीक्षण कैसे होना चाहिए?
प्रार्थना : बाहर आराम की ज़िन्दगी न मिले
यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बंधनं तदा।
मत्वेति हेल्या किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा ॥
~ अष्टावक्र गीता - 8.4
अनुवाद:
जब तक पुरुष में अहंकार बैठा है- "मैं ब्राह्मण हूँ," "मैं ज्ञानी हूँ," "मैं त्यागी हूँ,"
तब तक वह मुक्त कदापि नहीं हो सकता है।
विवेक बुद्धि द्वारा सारे कर्म तथा कर्मफल मुझ में अर्पित करके निष्काम,
ममता-रहित और शोक-शून्य होकर तुम युद्ध करो।
भगवद गीता - 3.30
तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥
ईशोपनिषद - 5
संगीत: मिलिंद दाते
~~~~~
Повторяем попытку...
Доступные форматы для скачивания:
Скачать видео
-
Информация по загрузке: