Hamaro Sahaja Sanehi Shyam | Kripaluji Maharaj Bhajan | Prem Ras Madira | हमारो सहज सनेही श्याम
Автор: Radha Krishna Mandir Cuttack
Загружено: 2020-10-18
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Written and Composed by Jagadguru Shri Kripaluji Maharaj
Prem Ras Madira-Biraha Madhuri
हमारो सहज सनेही श्याम ।
दृग अँसुवन सों पोय हार नित, पहिरावति उर-धाम ।
ललित-त्रिभंग अनंग-विमोहन, सुमिरति आठो याम ।
रसना सों निशि-वासर छिन छिन, गावति हरि-गुन-ग्राम ।
श्रवन सुनत नित प्रियतम-चरचा, सुधा-मधुर-मधु-नाम ।
हम 'कृपालु' उनके, वे मेरे, कहा जगत सों काम ? ।।
भावार्थ-
एक विरहिणी कहती है कि हमारे तो श्यामसुन्दर स्वभाव से ही प्रेमी हैं, अर्थात् उनसे बिना प्रेम किये मुझसे रहा नहीं जाता। मैं अपने प्रियतम को निरंतर ही आँसुओं की मालाएं गूंथ-गूंथकर, अपने हृदय के ऊपर जिसमें प्रियतम का निवास है, पहनाया करती हूँ। (दोनों आँखों से आँसू बहकर दो धाराओं में होते हुए वक्षस्थल के बीच में जाकर मिल जाते हैं, जिससे एक माला का स्वरूप बन जाता है ।) ग्रीवा, कमर एवं पैर तीनों जगह से ठेढ़े अनन्तकोटि कामदेवों को मोहित करनेवाले श्यामसुन्दर का आठों पहर स्मरण किया करती हूँ, एवं वाणी से दिन-रात प्रतिक्षण उन्हीं के गुणों को गाया करती हूँ। मेरा कान प्रत्येक दिन केवल प्रियतम के विषय में चर्चा एवं उनका अमृत से भी सुमधुर नाम का श्रवण करती हूँ | "कृपालु' कहते हैं कि वे हमारे 'प्रियतम' हैं और मैं उनकी 'प्रेयसी' हूँ, संसार से मुझे क्या लेना देना है ?
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