सारे कष्ट दूर करने वाली श्री विष्णु स्तुति - शान्ताकारं भुजगशयनं
Автор: Bhakti Jaap Mandir
Загружено: 2024-09-18
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In this beautiful rendition, we chant the powerful "शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं" mantra, a soulful prayer dedicated to Lord Vishnu, the preserver of the universe. This divine hymn praises Lord Vishnu's tranquil and majestic form, describing him as the one who rests on the serpent Sheshnag, with a lotus blooming from his navel, symbolizing the creation of the cosmos. His deep blue complexion, calm demeanor, and association with Goddess Lakshmi make him the source of peace and prosperity in the lives of his devotees.
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं,
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्,
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
इस श्लोक में भगवान विष्णु के दिव्य स्वरूप का सुंदर और विस्तारपूर्ण वर्णन किया गया है। श्लोक के हर शब्द और वाक्यांश में भगवान की विभिन्न विशेषताओं, उनके शक्तिशाली और शांतिपूर्ण व्यक्तित्व को दर्शाया गया है। आइए इस श्लोक को विस्तार से समझते हैं:
शान्ताकारं
इसका अर्थ है, “शान्त स्वरूप वाले”। भगवान विष्णु का स्वभाव शांति और संतुलन से परिपूर्ण है। वे हर परिस्थिति में शांति को बनाए रखते हैं, चाहे संसार में कैसी भी अशांति या विकार क्यों न हो। यह उनकी दिव्यता और आत्मनियंत्रण को दर्शाता है, जो कि हर परिस्थिति में समान रूप से बने रहते हैं।
भुजगशयनं
इसका अर्थ है, “सर्प पर शयन करने वाले”। यहाँ शेषनाग का उल्लेख है, जो भगवान विष्णु के शैय्या के रूप में कार्य करते हैं। शेषनाग अद्वितीय और शक्तिशाली सर्प हैं, जो भगवान की दिव्यता और उनके नियंत्रण की शक्ति को दर्शाते हैं। विष्णु का शेषनाग पर शयन करना यह बताता है कि वे सृष्टि के सारे विकारों और विनाशकारी शक्तियों पर विजय प्राप्त किए हुए हैं।
पद्मनाभं
इसका अर्थ है, “जिनकी नाभि से कमल उत्पन्न होता है”। यह भगवान विष्णु की सृष्टिकारी शक्ति का प्रतीक है। उनकी नाभि से कमल उत्पन्न होता है, और उस कमल से ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, जो सृष्टि की रचना करते हैं। यह भगवान विष्णु की सृजन शक्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक है।
सुरेशं
इसका अर्थ है, “देवताओं के स्वामी”। भगवान विष्णु को सभी देवताओं का स्वामी माना जाता है। वे देवताओं का नेतृत्व करते हैं और सृष्टि के संचालन में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। उनके आदेश पर ही देवता कार्य करते हैं और संसार की रक्षा होती है।
विश्वाधारं
इसका अर्थ है, “संसार का आधार”। भगवान विष्णु को पूरे ब्रह्मांड का आधार माना जाता है। वे सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन करते हैं और सृष्टि के हर तत्व को बनाए रखते हैं। सृष्टि की संरचना, स्थिरता और इसके क्रमबद्ध चलन का आधार भगवान विष्णु ही हैं।
गगनसदृशं
इसका अर्थ है, “आकाश के समान व्यापक”। भगवान विष्णु का स्वरूप आकाश की तरह असीम और अनंत है। वे हर जगह विद्यमान हैं, और उनकी महिमा और उपस्थिति समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है। यह उनके सर्वव्यापी होने की विशेषता को दर्शाता है।
मेघवर्णं
इसका अर्थ है, “मेघों के समान श्यामवर्ण”। भगवान विष्णु का वर्ण गहरे मेघों जैसा श्याम है। यह रंग गहराई, शक्ति और रहस्य का प्रतीक है। उनका श्याम रंग यह दर्शाता है कि वे अज्ञेय और असीमित हैं।
शुभाङ्गं
इसका अर्थ है, “जिनके अंग शुभ और सुंदर हैं”। भगवान विष्णु का शरीर और उनके सभी अंग सुंदर और कल्याणकारी हैं। उनके प्रत्येक अंग से दिव्यता और शुभता का प्रकट होना उनके पवित्र स्वरूप को दर्शाता है।
लक्ष्मीकान्तं
इसका अर्थ है, “लक्ष्मी के पति”। लक्ष्मी जी समृद्धि और संपन्नता की देवी हैं। भगवान विष्णु और लक्ष्मी का साथ यह दर्शाता है कि वे न केवल सृष्टि के रक्षक हैं, बल्कि समृद्धि और सौभाग्य के दाता भी हैं।
कमलनयनं
इसका अर्थ है, “जिनकी आंखें कमल के समान हैं”। भगवान विष्णु की आंखें कमल जैसी हैं, जो सुंदरता, सौम्यता और दिव्यता का प्रतीक हैं। उनकी आंखों में अपार प्रेम और करुणा है, जो भक्तों को शरण और सुरक्षा प्रदान करती हैं।
योगिभिर्ध्यानगम्यम्
इसका अर्थ है, “जो योगियों के ध्यान में सुलभ हैं”। भगवान विष्णु उन महान योगियों और तपस्वियों के ध्यान में आते हैं, जो उच्च साधना करते हैं। वे योगियों के लिए ध्यान के द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं, जो उनकी आध्यात्मिकता और ध्यानमग्नता को दर्शाता है।
वन्दे विष्णुं
इसका अर्थ है, “मैं विष्णु की वंदना करता हूं”। यह भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है, जो इस श्लोक के द्वारा व्यक्त की जा रही है।
भवभयहरं
इसका अर्थ है, “जो संसार के भय को हरने वाले हैं”। भगवान विष्णु संसार के सभी कष्टों और भय को हरने की शक्ति रखते हैं। वे संसार के जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्रदान करने वाले हैं।
सर्वलोकैकनाथं
इसका अर्थ है, “जो समस्त लोकों के एकमात्र स्वामी हैं”। भगवान विष्णु सभी लोकों के एकमात्र स्वामी और रक्षक हैं। यह दर्शाता है कि वे सभी जीवों के एकमात्र शासक और पालनकर्ता हैं।
यह श्लोक भगवान विष्णु की व्यापक और सर्वसमर्थ महिमा का वर्णन करता है। वे संसार के रक्षक, पालक, सृजनकर्ता और सभी के भय को हरने वाले हैं। उनके स्वरूप में शांति, शक्ति, सुंदरता और दिव्यता का अद्भुत संतुलन है।
Let the soothing vibrations of this Vishnu Stuti bring calmness, positivity, and devotion into your life.
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