क्या सांख्य दर्शन और महर्षि कपिल भगवान् को नहीं मानते ?
Автор: Prahari
Загружено: 2023-03-16
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प्रश्न- ईश्वरासिद्धेः ॥१॥ [ सां० सू० १।९२]
प्रमाणाभावान्न तत्सिद्धिः ॥२॥ [ सां० सू०५/१०]
सम्बन्धाभावान्नानुमानम् ॥३॥ [ सां० सू० ५।११] - ये सांख्यशास्त्र के सूत्र हैं ।
प्रत्यक्ष से ईश्वर की सिद्धि नहीं होती ॥ १ ॥
क्योंकि जब उसकी सिद्धि में प्रत्यक्ष ही नहीं तो अनुमानादि प्रमाण नहीं घट सकते ॥ २ ॥
और व्याप्ति-सम्बन्ध न होने से अनुमान भी नहीं हो सकता। पुनः प्रत्यक्षानुमान के न होने से शब्द - प्रमाण भी नहीं घट सकता ॥ ३ ॥
उत्तर - यहाँ ईश्वर की सिद्धि में प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, और न ईश्वर जगत् का उपादान कारण है । और पुरुष से विलक्षण अर्थात् सर्वत्र पूर्ण होने से परमात्मा का नाम 'पुरुष' और शरीर में शयन करने से जीव का भी नाम 'पुरुष' है। क्योंकि इसी प्रकरण में कहा है-
प्रधानशक्तियोगाच्चेत्सङ्गापत्तिः ॥ १ ॥
सत्तामात्राच्चेत्सर्वैश्वर्य्यम् ॥ २ ॥
श्रुतिरपि प्रधानकार्य्यत्वस्य ॥ ३ ॥ सांख्य सू० [५।८ ९, १२]
यदि पुरुष को प्रधानशक्ति का योग हो तो पुरुष में सङ्गापत्ति हो जाय। अर्थात् जैसे प्रकृति सूक्ष्म से मिलकर कार्यरूप में सङ्गत हुई है, वैसे परमेश्वर भी स्थूल हो जाय। इसलिये परमेश्वर जगत् का उपादान कारण नहीं, किन्तु निमित्त कारण है ॥ १ ॥
जो चेतन से जगत् की उत्पत्ति हो तो जैसा परमेश्वर समग्रैश्वर्ययुक्त है, वैसा संसार में भी सर्वैश्वर्य का योग होना चाहिये, सो नहीं है। इसलिये परमेश्वर जगत् का उपादान कारण नहीं, किन्तु निमित्त कारण है॥ २ ॥
क्योंकि उपनिषद् भी प्रधान को ही जगत् का उपादान कारण कहती है ॥ ३ ॥ जैसे—
अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां स्वरूपाः ॥ - यह श्वेताश्वतर उप० [अ० ४। मं० ५] का वचन है।
जो जन्मरहित सत्त्व, रज, तमोगुणरूप प्रकृति है वही स्वरूपाकार से बहुत प्रजारूप हो जाती है । अर्थात् प्रकृति परिणामिनी होने से अवस्थान्तर हो जाती है और पुरुष अपरिणामी होने से वह अवस्थान्तर होकर दूसरे रूप में कभी नहीं प्राप्त होता, सदा कूटस्थ निर्विकार रहता है और प्रकृति सृष्टि में सविकार और प्रलय में निर्विकार रहती है।
इसलिये जो कोई कपिलाचार्य को अनीश्वरवादी कहता है, वही अनीश्वरवादी है, कपिलाचार्य्य नहीं। तथा मीमांसा का धर्म-धर्मी से ईश्वर वैशेषिक और न्याय भी 'आत्म' शब्द से अनीश्वरवादी नहीं, क्योंकि सर्वज्ञत्वादि धर्मयुक्त और 'अतति सर्वत्र व्याप्नोतीत्यात्मा' जो सर्वज्ञादि धर्मयुक्त सर्वत्र व्यापक सब जीवों का आत्मा है, उसको मीमांसा, वैशेषिक और न्याय 'ईश्वर' मानते हैं।
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