1. आत्मसिद्धि शास्त्र, श्रीमद् राजचंद्रजी। बाह्य आडंबर और शुष्क ज्ञानी दोनों ही मिथ्यादृष्टि हैं।
Автор: Atma So Parmatma
Загружено: 2026-01-25
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यह वीडियो श्रीमद् राजचंद्रजी द्वारा रचित "आत्मसिद्धि शास्त्र" पर आधारित है, जिसे उन्होंने विक्रम संवत 1952 में नाडियाड में लिखा था (0:04-0:08)। इस शास्त्र में आत्मा के स्वरूप को न्यायपूर्वक समझाया गया है और इसे समझने के महत्व पर जोर दिया गया है (0:30-0:33)।
वीडियो के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
आत्मा का स्वरूप (0:28-0:55): आत्मा नित्य है, ज्ञान का कर्ता है, और स्वभाव से भोगता है। अज्ञानवश यह राग-द्वेष और हर्ष-शोक का भी भोगता है।
सद्गुरु का महत्व (1:31-2:25): शास्त्र की शुरुआत सद्गुरु भगवंतों की विनय से होती है, क्योंकि उन्होंने आत्मा के स्वरूप को समझाया है, जिसके बिना जीव अनंत दुखों को प्राप्त होता है।
आत्मज्ञान की आवश्यकता (2:31-3:00): आत्मा के स्वरूप को जाने बिना सभी कलाएँ व्यर्थ हैं। यह नहीं कहा गया कि किसी क्रिया या विद्या के अभाव में दुख पाया, बल्कि आत्मज्ञान के अभाव में दुख पाया।
आत्मा की अरूपिता (3:14-3:57): आत्मा अरूपी, निर्दोष आनंद मूर्ति है, जो मन, वचन, काया, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श और यहाँ तक कि पुण्य, पाप, राग, द्वेष के विकल्पों से भी रहित है।
मोक्ष मार्ग की लुप्तता (12:10-14:30): श्रीमद् राजचंद्रजी कहते हैं कि वर्तमान काल में मोक्ष मार्ग लुप्तप्राय हो गया है, लेकिन यह पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ है। बहुत कम संख्या में मोक्ष मार्गी जीव देखे जाते हैं।
क्रिया जड़ और शुष्क ज्ञानी (25:40-26:40): वीडियो में दो प्रकार के अज्ञानी जीवों का उल्लेख है:
क्रिया जड़: जो केवल बाह्य क्रियाओं (पूजन, पद्धति आदि) में धर्म मानते हैं।
शुष्क ज्ञानी: जो केवल शास्त्रों के शब्दों से ज्ञान प्राप्त करते हैं, लेकिन अंतरंग वैराग्य और क्रोध-मान-माया-लोभ को दूर करने का पुरुषार्थ नहीं करते।
आत्मार्थी के लिए उपदेश (19:31-20:09): जिसे सच्चा सुख और हित करना हो, उसे सद्गुरु समागम द्वारा सच्चे न्याय का निर्णय करना चाहिए, श्रवण, मनन और तुलना करनी चाहिए ताकि सर्वज्ञ भगवान के वचनों का आशय समझ में आ सके।
ज्ञान मार्ग का निषेध (54:37-56:04): जो ज्ञान मार्ग का निषेध करते हैं और कहते हैं कि केवल आत्मा-आत्मा रटने से मोक्ष नहीं होगा, उन्हें क्रिया जड़ कहा गया है, क्योंकि वे सच्चे न्याय मार्ग का विरोध करते हैं।
अज्ञान की जड़ (56:33-58:19): अज्ञानी जीव पुण्य-पाप को अपना मानते हैं और सोचते हैं कि वे क्रियाओं के कर्ता हैं, जो कि मिथ्या ज्ञान और अहंकार है। इसी भूल को अज्ञान कहा गया है, जो संसार का मूल कारण है।
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