LOLARK CHHATH IN VARANASI लोलार्क छठ
Автор: Chitransh Art (LENSMAN)
Загружено: 2017-08-27
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पौराणिक मान्यता के अनुसार, काशी के भदैनी में स्थित लोलार्क कुंड में सूर्य की पहली किरण के साथ दंपति को स्नान करना चाहिये। स्नान के साथ ही कुंड में गुप्तदान भी करना चाहिये। माना जाता है कि जिन दंपति को संतान नहीं होती, उन्हें यह स्नान और व्रत रखने से संतान की प्राप्ति होती है।
लोकार्क कुंड में सूर्य की पहली किरण के साथ स्नान करने की परंपरा है। लोलार्क छठ के विशेष दिन पर मनोकामना पूरी होने लिए विदेशों से भी श्रद्धालु आते हैं। मान्यता है कि देवासुर संग्राम के समय भगवान सूर्य के रथ का पहिया इसी स्थान पर गिरा था। इससे ही कुंड का निर्माण हुआ था। इसी स्थान पर लोलार्क नाम के असुर का भगवान सूर्य ने वध किया था। यह भी कहा जाता है कि महाभारत काल में कुंती को सूर्य उपासना से ही दानवीर कर्ण जैसे पुत्र की प्राप्ति हुई थी।
स्नान के पश्चात् महिलाएं घाट पर ही भगवान सूर्य की पूजा करती हैं। मान्यता है कि दंपति जिन कपड़ों में स्नान करते हैं, उसे घाट पर ही छोड़ देते हैं। साथ ही हाथ में फल और सब्जी लेकर भगवान को संकल्पित किया जाता है। जिस फल-सब्जी को लेकर संकल्प करते हैं, उसे तबतक नहीं खाया जाता, जब तक मनोरथ पूरा नहीं होता।
दिव्य लोलार्क कुंड काशी के भदैनी इलाके में है। यह कुंड बेहद ही छोटा है। संकरी गली में है। वाराणसी के तुलसीघाट से पैदल दूरी पर यह कुंड है। महाभारत में कुंड का उल्लेख मिलता है। रानी अहिल्याबाई होल्कर ने कुंड के चारों तरफ कीमती पत्थर से सजावट करवाई थी। यहीं पर लोलाकेश्वर का मंदिर भी है।
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