संत सुभाष शास्त्री ने संगत को "देह का सत्य" क्या होता है के बारे में बताया
Автор: Kathua news File
Загружено: 2026-03-07
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संत सुभाष शास्त्री ने संगत को "देह का सत्य" क्या होता है के बारे में बताया
-दयाला चक के बन्नू चक में श्रीमद् भागवत कथा के पाचवें दिन परमज्ञानी संत, श्री सुभाष शास्त्री जी ने भागवत ज्ञान का प्रसाद कथा को माध्यम बनाकर संगत की देना जारी रखते हुए "देह का सत्य" क्या होता है के विषय में बताते हुए आपने प्रवचनों के द्वारा एक कथा सुनाई : प्राचीन समय में एक राजा, अपने दल-बल के साथ साथ, जंगल में शिकार के लिए गया। शिकार के पीछे भागते -भागते वह अपने साथियों से भटक गया। जंगल बहुत घना था और वर्षा भी होने लगी थी। समय के साथ सूर्य भी अस्त हो चुका था तथा जंगली जानवरों की आवाजें सुन राजा पूर्णतः भयभीत हो गया था। राजा भटकते हुए रात बिताने के लिए आश्रय ढूंढ रहा था।
शास्त्री जी ने कथा को आगे बढाते हुए कहा कि-राजा को तभी घने अंधकार में दूर रोशनी की एक किरण दिखाई दी, वह एक बहेलिये की झौंपड़ी में दीपक चल रहा था। राजा जब उस झोप ढ़ी में पहुंचा तो वहां का दृष्य देखकर घबरा गया। बहेलिया वृद्ध था इसलिए इस मूल-मूत्र के लिए भी अंदर स्थान बना रखा था तथा चारों तरफ उसने मांस लदका रखा था। इतना नरक तुल्य जगह देख राजा आचंभित रह गया लेकिन और कोई ई उपाय न देख राजा ने बहेलिये से एक रात्रि बिताने की विनती भी की। बहेलिया बोला- अक्सर लोग विश्राम के लिए यहां आते हैं, लेकिन जाने में बहुत ही झगड़ा करते हैं, सबको सुबह होने पर मेरी झौपड़ी परमप्रिय हो जाती है। आप कहीं और जाइये।
कोई उपाय न जान राजा दीन स्वर में बोला-देखो, मैं वचन देता हूं, सूरज की पहली किरण के साथ ही मैं आपकी झौपड़ी छोड़ दूंगा, बहेलिया बोला ठीक है, रात्रि मतलब रात्रि, मुझे कोई कष्ट नहीं चाहिए। साधुको ! रात भर झौपड़ी की दुर्गन्ध राजा के मन-मस्तिष्क - में ऐसे रस-बस गई कि सुबह उठते ही राजा को झौपड़ी परमप्रिय लगने लगी। उधर बहेलिये ने उठते ही कहा- महाराज ! उठिए और
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