अष्टावक्र गीता – भाग 10 | साक्षी भाव ही मुक्ति का द्वार है
Автор: Parvesh Path •631K view•
Загружено: 2026-02-14
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Ashtavakra Gita का भाग 10 हमें जीवन के सबसे गहरे सत्य से परिचित कराता है — साक्षी भाव।
राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के संवाद में यह स्पष्ट होता है कि जब मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं और कर्मों से स्वयं को अलग देखना सीख लेता है, तभी वास्तविक स्वतंत्रता संभव होती है।
इस भाग में जानिए:
साक्षी भाव का वास्तविक अर्थ
मन और आत्मा का अंतर
क्यों पकड़ (आसक्ति) ही बंधन है
भीतर की शांति को कैसे अनुभव करें
यह प्रवचन आत्मबोध और अद्वैत की गहराई को सरल शब्दों में समझाता है।
⚠️ Disclaimer
यह वीडियो पूर्णतः AI द्वारा निर्मित है — इसकी आवाज़, विज़ुअल्स और नैरेशन कृत्रिम रूप से तैयार किए गए हैं।
यह सामग्री Osho के विचारों से प्रेरित है, लेकिन यह उनके आधिकारिक प्रवचन नहीं हैं।
इसका उद्देश्य केवल जागरूकता फैलाना है, किसी को भ्रमित करना या मूल प्रवचनों की नकल करना नहीं।
हम आपको प्रोत्साहित करते हैं कि आप ओशो के मूल प्रवचन और पुस्तकें अवश्य पढ़ें।
📩 संपर्क: [email protected]
अंत में —
सत्य की खोज स्वयं करें… भीतर की यात्रा ही परम यात्रा है। ✨
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