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Aishi Choudhary | शिशुपाल वध | सतीश सृजन | कविता | महाभारत | Shishupal Vadh | Satish Srijan | Poem

Автор: Aishi Choudhary (Masti Masala)

Загружено: 2025-09-28

Просмотров: 150

Описание: ग्रीनआर्च दुर्गा पूजा 2025

करके आधीन सारे राजा, जब चक्रवर्ती बन जाता हैं।
आयोजन करता महायज्ञ,जो राजशूय कहलाता है।

थी बढ़ी युधिष्ठिर की इच्छा, राजशूय यज्ञ करवाने की।
मंशा प्रचंड थी राजा में, सम्राट अजय कहानें की।

राजा ने ऋषि मुनियों द्वारा, आयोजन भव्य कराया था।
नाते रिश्ते सारे राजा, सबको न्योता भिजवाया था।

कोई रंक हो या हो बढ़ नरेश, बिन माधव कोई बाजूद नहीं।
सारे विधान फल हीन सदा, यदि मधुशूदन मौजूद नहीं।

यह सोच युधिष्ठिर ने भेजा, पहला न्योता गिरधारी को।
अनुनय करके बुलवाया था, बैठाया पास मुरारी को।
सब राजे आए सज धज कर, शिशुपाल को भी बुलवाया था।

श्री कृष्ण का यूं सम्मान देख, बो मन ही मन गुस्साया था।
बचपन से बैर ठान रक्खा, शिशुपाल ने श्री गोविंदा से।
हरि से विरोध ना हितकारी, यह कौन कहे मतिमंदा से।

जो रीत यज्ञ की अलबेली, आरंभ बहा से होना था।
पहली पूजा पूरे मन से, सर्वोच्च देव को देना था।
हैं कौन भला सर्वोच्च यहां, जिसे पहली पूजा दी जाए।
सहदेव कृष्ण का नाम लिया, सारे के सारे हर्षाए।

अनुमोदन भीष्म पितामह कर, प्रस्ताव सहज स्वीकार किया।
सारे सहमत थे पर मन में, शिशुपाल ने है प्रतिकार किया।
एक शब्द न बोला निज मुख से, लेकिन अंदर जल भुन बैठा।
सबके मुख मंडल हर्षित था, शिशुपाल दिखा ऐंठा ऐंठा।
की सर्व सम्मति से आरंभ, कुंती सुत ने हरि की पूजा।
मन ही मन थे प्रसन्न बहुत, माधव सम जग में ना दूजा।
सारा ब्रह्मांड तरसता है, नारायण आज कृपालु हुए।
कोई पुण्य विशेष मेरा जागा, यह सोच के सभी निहाल हुए।

केशव की कृपा से केशव को, आचार्य कर रहे थे बंधन।
पंचम दश सौणिश की विधि से, पूजा करवाते यदुनंदन।
सत्कार कृष्ण का सह न सका, शिशुपाल क्रोध भरके बोला।
तुम सब लोगों की मति मारी, गीदड़ को नाहर सम तौला।

बोला सहदेव तू अभी बच्चा हैं, सर्वोच्च की तुझे नहीं पहचान।
तूने अयोग्य को योग्य कहा, नहीं होगा पूरा अनुष्ठान।
सब मिलकर पुनः विचार करो, खोजो कोई नर सम्हानि।
महाराज युधिष्ठिर समझाओ, सहदेव बात ये बचकानी।
अचरज है भीष्म पितामह, जिसने अनुमोदन कर डाला।
इस सभा में ना कोई और मिला, सर्वोच्च दिखा बस ये ग्वाला।

गंगा सुत तू हो गया वृद्ध, तन मन दोनों में जान नहीं।
तेरा अनुमोदन दिखता हैं, तुझे खर खोटे भान नहीं।
मुझे लगा भीष्म है ज्ञान बान, लेकिन ये तो अज्ञानी हैं।

ये कृष्ण को कहता उच्च देव, कैसी इसकी नादानी हैं।
ये दुष्ट निकम्मा नकारा, काला अनपढ़ है गवार निपट।
बनवासी सा पहनावा है, अन्दर बाहर है भरा कपट।
मां बाप के इसके पता नहीं, ना गोत्र बंश का लेखा हैं।

घर घर माखन चोरी करता, जाने इसमें क्या देखा हैं।
कितने सारे निर्दोषों को, चोरी से छल से मारा हैं।
सर्वोच्च इसे कभी ना मानू, ये छलिया है हत्यारा हैं।

गोपी संग यहां बांह फिरता, किन्नर बनके नाचे गाए।
चोरी करते पकड़ा जाता, बहुधा ये ग्वाला पिट जाए।
औरों के टुकड़ों पर पलता, एक कोड़ी नहीं कमाता हैं।
फिरता रहता मारा मारा, मंगतों सा मुरली बजाता हैं।
रखवाली करता गायों की, ब्रज गांव का है ये चरवाहा।
गैय्या दिनरात चराता है, नन्द राय के घर जो हरवाहा।
वृषभानु लली आगे पीछे, जब देखो तब मंडराता हैं।
खोटे चरित्र का चाल चलन, ये बिल्कुल मुझे न भाता हैं।

ये गीदड़ है पर चाह इसे सिंघो सी इसकी शान खिले।
जब है डरपोक सियारों सा तो क्यों सर्वोच्च कमान मिले।
है ना आमात ना राजा हैं, ना देव पित्र गंदर्भ नहीं।
ना सैनिक है ना योद्धा हैं, इसका कोई संदर्भ नहीं।

गाली पर गाली उगल रहा, शिशुपाल विवेक विहीन बना।
विपरीत बुद्धि है नाश काल, बक रहा मूर्ख अपशब्द घना।

संपूर्ण लोक के स्वामी को, शिशुपाल नहीं पहचान सका।
जाने क्यों व्यर्थ उलझ बैठा, ना हरि की कृपा को जान सका।

कितने अनुयाई माधव के, अपशब्द और अब सह ना सके।
दरबार छोड़ कर चले गए, लाचारी थी कुछ कह ना सके।

अर्जुन का पारा चढ़ गया था, गांडीव पर तीर चढ़ा डाला।
कर गधा उठाए भीमसेन, दौड़ा जो हाथी मतवाला।
गिरधारी अब भी शीतल थे।

तिनका भर भी ना शोक किया, फिर याद प्रतिज्ञा दिला तभी।
कान्हा दोनों को रोक लिया, श्री कृष्ण बताया पांडव को।

शिशुपाल फुफेरा भाई हैं, एक सौ अपराध की क्षमा इसे,
ऐसी प्रतिज्ञा खाई है।

शिशुपाल मृत्यु का कारण हूं, ज्योतिषियों ने बतलाया था।
तब अपनी बुआ के अनुनय पर, मैंने संकल्प उठाया था।

अर्जुन बोला कान्हा तुम होगे बचन बद्ध, लेकिन मुझपर ना पाबंदी।
मेरे जीवित रहते कैसे दे गया इतनी गाली गंदी।
हे शखा मुझे तुम आज्ञा दो, पौरुष अपना दिखलाऊंगा।
एक श्वास भी ना ले पाएगा, यमलोक अभी पहुंचाऊंगा।

बलशाली भीमसेन बोला, माधव आज्ञा की देरी हैं।
शिशुपाल मिलेगा मिट्टी में, मेरी गधा की मार घनेरी हैं।

तुम दोनों धैर्य धरो मन में, ये स्वयं कर्म फल पाएगा।
इसका है अंत मेरे हाथों, नहीं कोई विधान बचाएगा।
शिशुपाल अभी भी बोल रहा, मुख से अपशब्द मुरारी को।।

99 अपराध हुए पूरे!
है शेष एक सौ गारी को, हरि सब पर रहते दयावान, कोई कितना हो अत्याचारी।
यह सोच उसे किया साबधान, शिशुपाल ना दे अगली गाली।

था बुद्धिहीन ना ध्यान दिया, सौ बां अपशब्द भी कह डाला।
फिर क्या था सौम्य गोविन्दा का, एक रूप दिखा बहु बिकराला।
शिशुपाल मृत्यु अब निश्चित थी।

नहीं बन सकता अब कोई ढाल, अति क्रोध झलकता था मुख पर, लगता आ गए हो महाकाल।
श्री कृष्ण कुपित हो कर बोले, मेरी बुआ के कारण शेष रहा।
सौ गाली माफी का प्रण था, लेकिन अब कुछ ना शेष रहा।
प्रण हुआ पूर्ण मेरा तुझको, अब कोई बचा ना पाएगा।
तेरे अपराध ना क्षमा योग्य, तत्काल तू मारा जाएगा।
अगला अपशब्द निकलते ही, तब चक्र सुदर्शन बार हुआ।

था अंत लिखा हरि के हाथों से, शिशुपाल संहार हुआ।
छेदी नरेश हरि द्रोही था, थी काल गति बन गया अधम।
सौ गाली पूरी होते ही, श्री कृष्ण किया शिशुपाल वद्यम्।।

हरि को शिशुपाल न जान सका, दुर्भाग्य से अरि सम् किया काम, गोविंद के हाथों मर कर के
सीधा पहुंचा गोलोक धाम!!

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