रात 12 बजे महाआरती के बाद नगाड़ा बजते ही सैकड़ों महिला पुरुष को भाव आये गोंड आदिशक्ति पीठ चौगान मंडला
Автор: Bharat Darshan
Загружено: 2024-04-18
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मंडला जिले से करीब 20 किलोमीटर दूर आदिवासियो की तीर्थ स्थली चौगान की मढ़िया में नवरात्रि में नवमी का त्योहार अनोखे तरीके से मनाया जाता है. यहां जमीन से करीब 25 फीट ऊपर बने स्वर्ग की सीढ़ी पर दीप जलाकर इसकी शुरुआत की जाती है. फिर मढ़िया के कोने-कोने पर दीप जलाए जाते हैं. हजारो की संख्या में रखे जवारों पर भी दीए जलाए जाते हैं. फिर यहां पर मौजूद श्रद्धालुओं को महादेवी का संदेश सुनाया जाता है. संदेश के बाद मढ़िया में नगाड़े बजने लगते हैं. जैसे ही नगाड़े की धुन लोगों के कानों में सुनाई देती है, सैकड़ों लोग एकसाथ बाहर निकल आते हैं और भाव खेलने लगते हैं. नवरात्र को मनाने के लिए कई राज्यों से हजारों लोग पहुंच रहे हैं. आखिर क्यों 'स्वर्ग की सीढ़ी' पर दीप जलाकर की जाती है महाआरती, क्यों रखे जाते हैं हजारों की संख्या में जवारे,
यहां पर नवरात्र में विशेष पूजा की जाती है. सभी लोग शाम के समय और खाना खाने से पहले पूजा करते हैं लेकिन इस मढ़िया में खाना खाने के बाद रात करीब 10 बजे के बाद पूजा शुरू की जाती है. पूजा की शुरूआत 'स्वर्ग की सीढ़ी' से की जाती है. सबसे पहले सुतली के सन से जमीन से करीब 25 फीट ऊपर जाकर स्वर्ग की सीढ़ी पर दीप जलाया जाता है. फिर पंडा उस सन को बिना मुढ़े जमीन पर फेंक देता है. फिर उसी सन को उठाकर मढ़िया के लाल कपड़ों और बैच पहनकर खड़े चपरासी उसे उठाकर नीचे रखे दीयो को जलाते हैं. दीपक मंदिर के कोने-कोने पर रखे जाते हैं. बाद शुरू होती चौगान की मढ़िया की महाआरती.यह आरती करीब 15 मिनट तक चलती है. इसके बाद मढ़िया में हजारों की संख्या में मौजूद लोग एकसाथ सिर टिकाकर मां की आरधना करते हैं. फिर एक-एक कर मढ़िया में मौजूद चपरासी महादेवी का संदेश सुनाते हैं. महादेवी के संदेश के बनाते नगाड़े बजाने का आदेश आता है. नगाड़े की थाप बजते ही ध्वनि जैसे ही लोगों के सुनाई देती है, वे बहार मैदान में आ जाते हैं और एकसाथ भाव खेलने लगते हैं. करीब आधा घंटे बाद मढ़िया का पंडा राख उड़ाता है. उसके बाद भाव खेलने वाले लोग शांत हो जाते हैं और अपनी माता की ओर भागते हैं, जिन्हे पंडा शांत कराता है.
मध्यप्रदेश के मंडला जिला मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर प्रसिद्ध चौगान मढ़िया जो की गोंड आदिवासी शक्तिपीठ है जिले के रामनगर के समीप गांव चौगान में मढिय़ा स्थित है। इस वर्ष यहां 3500 से अधिक जवारे की स्थापना की गई थी। आदिवासी समाज की इस मढिय़ा में एक विशेष वेशभूषा सफेद वस्त्र में ही श्रद्धालू यहां नौ दिनों तक रहकर पूजा में शामिल होते हैं। सुबह करीब 2 किमी पैदल चलकर जवारे सिर में रखे हजारों भक्त नर्मदा तट रामनगर पहुँचकर जवारे नदी में विसर्जित करते हैं। जिसे देखने के लिए हजारों शृद्धालु एकत्रित होते हैं। जवारों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो दूर दूर तक गेहूं के खेत हो बहुत ही अद्भुत नजारा होता है
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