दो सिगरेट | यश शुक्ला
Автор: TLS IIT KGP - Technology Literary Society
Загружено: 2021-06-03
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दो सिगरेट | यश शुक्ला
हर लेखक की जिंदगी कई पहलुओं से होकर गुजरती है। कुछ को बोल कर समझा सकते हैं पर कुछ को लिखा जाना भी जरुरी है ताकि उसको हर व्यक्ति अपने हिसाब से जान सके,महसूस कर सके। जीवन में मची ऐसी ही कश्मकश और उसको घेरे हुए कई सम्भावनायें जब आपके पास होती हैं तो किस प्रकार से लेखक के विचार और उसके मनोभाव प्रदर्शित होते हैं , उसको बहुत ही बेहतरीन ढंग से Yash Shukla ने यहाँ अपनी कविता दो सिगरेट के माध्यम से प्रस्तुत किया है। इसको सुनने के बाद आप भी आत्मचिंतन करिए और comments में अपनी दो सिगरेट के किस्से/कहानियों को अपने हिसाब से सबके साथ साझा कीजिये।
Yash Shukla has been an active member of the KGP Cultural community not only representing IIT KGP in Inter IIT Competitions over the years but also bagging accolades for the institute. He captained the Literary contingent in 2018 and was also the Governor of TLS. You might have seen him recently in Dastoor, the gold-winning Inter IIT film which he wrote as well.
Lyrics:
ये रात अभी बाकी है,
और वो बात समझाना तुम्हे
की हर कोई राइटर क्यों नहीं होता?
चलो,
मैं अपने पल रोकता हूँ,
तुम भी अपने लम्हे थामो,
सूरज को साहिल से
झाँकते एक साथ देखेंगे।
मैं तुम और हमारी
दो सिगरेट,
हाँ जैसा तुमने कहा था,
एक बार में एक ही जलाएँगे
एक कश तुम लेना
एक कश मैं लूँगा,
और मैं तब भी नहीं मुस्कुराऊंगा
यह बात जानकर की
तुमने पहले कभी किसी और
के साथ सिगरेट शेयर नहीं की।
जैसे-जैसे ऐश गिरेगी,
तुम्हारी कुछ कहानियाँ
मेरे अफ़सानो को बोसा देंगी।
जब मेरा गला भर जाएगा
तो बेझिझक ही तुम्हारे हाँथ मेरी पीठ
को सहलायेंगे।
और जब तुम बोलते-बोलते रुक
जाओगी,
तो मेरे लफ्ज़ तुम्हारे अलफ़ाज़ बन जाएँगे।
एक-एक करके नए-नए उन्वान सामने आएँगे,
कुछ मेरी डायरी से होंगे,
कुछ तुम्हारे दिल के सफ़ों से,
पर जितनी बार सिगरेट पर लगे तुम्हारे
लब का स्पर्श मेरे लब से होगा,
यह दोनों आपस में घुलते जाएँगे।
“लिख दूँ तेरे बारे में कुछ आज” से लेकर
“तुम्हे नहीं लगता” तक सारी कवितायें समझाऊँगा
क्यूंकि सुन और पढ़ तो तुम पहले ही चुकी हो।
तुम्हे यह भी बताऊँगा की प्रेमचंद से ज़्यादा
मंटो मुझे अच्छे लगते है।
कि मैंने गॉडफादर कितनी बार पढ़ी है,
और रेवोलुशन 2020 का शुक्ला जी वाला
करैक्टर कितना याद है मुझे।
मैं तुम्हे यह भी बताऊँगा की
मेरी माँ ने मुझसे बोलना बंद कर दिया हैं,
सिर्फ इसलिए की मैं अपने आप को
अब भी बच्चा समझता हूँ,
जबकि उनकी नज़रों में मैं कब का
बड़ा हो गया हूँ।
पापा अक्सर कहते रहते हैं
यह लिखना-विखना साइड की चीज़ें हैं,
करियर पर ध्यान दो,
अब उनसे क्या कहूँ,
की फिल्म स्कूल से तो पहले ही दूर
कर दिया था, अब एक कलम भी नसीब
में नहीं होने दोगे।
याद आतें मेरे वो सारे दिन जब
आईने में देख कर मैं खुदको कोसता रहता
की इतनी तकलीफ़ें हैं तो फिर मर क्यों नहीं जाता?
तब अंदर से कुछ लफ्ज़ आवाज़ की सरगोशी में
लब के किवाड़ बहार आते हैं,
और सुनाई पड़ते हैं,
यह साँसें इतनी भी कमज़ोर नहीं,
अभी मौत उतनी भी मक़बूल नहीं।
यह बिलकुल वैसा ही एहसास होता हैं,
जैसा पहली बार इस दुनिया में
आँखें खोलने पर हुआ होगा,
ज़िन्दगी ने कसकर बाहों में भरा होगा,
शायद ज़िंदा होना महसूस हुआ होगा
अक्सर यही लगता हैं ग़मगीन होने पर मुझे।
चलो दूसरी सिगरेट जलाते हैं,
बहस से दूर
विश्वास की ओर जाते हैं।
कहा था मैंने
वहीं हम दोस्त बन जाते हैं,
मोहबत्त से एक कदम और आगे,
insecurity और possessiveness
की बेड़ियों से दूर,
एक दुसरे में वैसे ही मिल जातें हैं
मानो तुम सिगरेट का धुआं हो
और मैं हवा।
ख़ैर,
मैं जानता हूँ मैं तुम्हारा बहुत समय ले चूका हूँ,
मैं जानता हूँ तुम्हे और भी बहुत से काम करने हैं,
मैं जानता हूँ इतना ही हिस्सा हैं तुम्हारे किस्से में मेरा,
मैं जानता हूँ तुम में अब भी बहुत कहानियाँ बाकी हैं,
लेकिन तुम्हारे और मेरे साथ के पल ख़त्म हो रहे हैं,
तुम्हे इन लम्हो में समेट लेना चाहता हूँ,
जो कभी न कभी कुरेद दूँगा
किसी डायरी के सफ़े पर
और हिस्सा बना लूँगा अपने अंदर तुम्हारा,
महज़ चंद घड़ी बैठ मेज़ पर।
कहानियाँ सबके पास होती हैं
पर हर कोई राइटर नहीं होता,
क्यूंकि इस दुनिया में सब बयां नहीं होता,
कुछ दिल की खामोशियों में धड़कता हैं,
कुछ किताबों से गूंजता फिरता।
मैं उस गूंज का शोर हूँ,
जज़्बात संभाल नहीं पाता,
तो उन्हें शब्दों में घोलकर छलका देता हूँ,
लेकिन तुम जज़्बाती मत बनना
नहीं तो ख़ामख़ा कलम उठा लोगी।
मेरे बिरादरी में आना मत
दोस्ती से गिरकर, इश्क़ में पड़ जाओगी
थमने का नाम नहीं वो गाड़ी,
यूँही चलती जाएगी।
ख़ैर,
चलो इधर से हम चलते हैं,दूसरी सिगरेट भी ख़त्म हो गयी हैं,
या फिर कुछ पल थमना हैं तुम्हे,
साथ में देखना हैं तुम्हे,
रात को बीतते हुए,
सूरज को साहिल से झाँकते हुए?
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