95th वार्षिकोत्सव समारोह Divyavani - Sant Pravar Sri Vigyan deo ji Maharaj
Автор: Vihangam Yoga
Загружено: 2018-12-20
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विहंगम योग के सबसे बड़े पर्व वार्षिकोत्सव समारोह (95वें आयोजन) के प्रथम दिवस - दिव्यवाणी के कुछ मुख्य बिन्दु:-
• कैसी भी परिस्थिति हो, शिष्य सेवा, सत्संग और साधना से दूर नहीं जा सकता।
• संसार में अनुकूलता और प्रतिकूलता लगी रहती है। यहाँ पर कुछ भी स्थिर नहीं रहने वाला है।
• आज परिवार बिखर रहे हैं। अशांत मन परस्पर प्रेम को कम देता है। स्वर्वेद से समाज में प्रेम का साहचर्य का माहौल बनता है।
• जो भी भक्ति के मार्ग पर लगा रहता है उसका संसार भी सुधर जाता है, और परलोक भी सुधर जाता है।
• शिष्य वही है जिसके अन्दर सेवा और समर्पण का भाव है।
• सेवक क्या नहीं कर सकता? आप सबों क्या नहीं कर दिखलाया है? आप सबों ने मिलकर 21000 कुण्डीय स्वर्वेद उत्तरार्द्ध ज्ञान महायज्ञ को ऐतिहासिक सफलता के साथ पूर्ण कर दिया। स्वर्वेद महामन्दिर पूर्ण होते ही देश-विदेश में प्रचार और तेजी से होने लग जायेगा। अगले डेढ़ से दो साल में यह कार्य पूर्ण हो जाना है।
• दुःख से सभी घबराते हैं और सुख सबको प्रिय है। हम सभी अनुकूलता चाहते हैं।
• ये जीवन केवल अर्थ और काम तक सीमित नहीं रह सकता। ये जीवन केवल शरीर को सम्भालने में व्यतीत नहीं हो सकता।
• हमारे मन में कामनाएँ बहुत हैं। और हो भी क्यों न? हमारे कई कार्य हैं। हम बहुत कुछ चाहते हैं। मनुष्य का मन कामनाओं से, विचारों से बंधा है। कामनाएँ बुरी नहीं हैं। इच्छा करना बुरा नहीं है। लेकिन कामनाओं और इच्छाओं के पहले विवेक की आवश्यकता है, सद्बुद्धि की आवश्यकता हो। हमारी इच्छा ज्ञान युक्त हो। सद्इच्छा हो। अर्थ और काम भी चार पुरुषार्थों में से हैं।
• स्वर्वेद हमारे शुभ संस्कारों और विवेक को जागृत करता है।
• हमारे मन में बड़ी शक्ति है। और वो शक्ति बिखर रही है। उन्ही शक्तियों को एक साधक साधता है, समेटता है। इसी अनियन्त्रित हो रही शक्ति को नियंत्रित करता है।
• शरीर में 80% समस्याएँ कहीं न कहीं अशांत, अनिश्चित मन के कारण उत्पन्न होती हैं।
• विहंगम योग पर अनेक शोध हुए हैं जो इसके अद्भुत भौतिक प्रभावों को सिद्ध करते हैं। लेकिन आत्मगत अनुभवों को कोई मशीन नहीं नाप सकती। अध्यात्म को प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। फिर भी, आज के संदर्भ में अध्यात्म के आरम्भिक अनुभवों को समझने के लिए ये वैज्ञानिक शोध अत्यंत आवश्यक हैं।
• स्वर्वेद महामन्दिर में अनेक सेमिनार होंगे जिसमें वैज्ञानिक, चिंतक और विचारक सम्मिलित होंगे।
• जैसी हमारी साधना है और जितना बड़ा हमारा विज्ञान है, जैसा उसे लोगों तक पहुँचना चाहिए, शायद हम वहाँ तक नहीं पहुँच पा रहे। इतना बड़ा ज्ञान और इतने वैज्ञानिक परिणाम। इस ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना है। यह कर्तव्य हम सबका है।
• हम चाहते हैं करना लेकिन हमें समझ में नहीं आता। तो आप जहाँ हैं, वहीं से शुरु कर सकते हैं। आपको बस समय दान देना है। वह शक्ति हमारे साथ है। हमें बस लग जाना है। आश्रम के नियम-नियंत्रण में रहकर कार्य को आगे बढ़ाना है। क्षेत्रीय कार्यालयों का गठन हुआ है, वहाँ से सम्पर्क कर सकते हैं, केन्द्रीय कार्यालय से सम्पर्क कर सकते हैं।
• जो आत्मा का दीदार कराता है वही है विहंगम योग।
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