ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ! 108 TIMES Chanting | दुःख और कल-क्लेश का नाश कर शांति प्रदायक
Автор: Dyal Films & Music
Загружено: 2026-01-03
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ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ! 108 TIMES Chanting | दुःख और कल-क्लेश का नाश कर शांति प्रदायक मंत्र #bhajan #krishna #krishnabhajan #omkrishnayavasudevaya #devotionalsong #chanting #srikrishna @dyalfilmsmusic
मंत्र
ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥
✨ इस मंत्र की विशेषताएँ (Visheshatayen)
1️⃣ यह मंत्र भगवान श्रीकृष्ण के समग्र स्वरूप को संबोधित करता है —
कृष्ण (आकर्षण और प्रेम)
वासुदेव (दिव्य चेतना)
हरि (दुःख हरने वाले)
परमात्मा (सर्वव्यापक सत्य)
गोविन्द (इंद्रियों और पृथ्वी के रक्षक)
2️⃣ यह मंत्र शरणागति भाव का मंत्र है —
इसमें साधक स्वयं को समर्पित कर देता है, इसलिए यह अहंकार को धीरे-धीरे शांत करता है।
3️⃣ यह मंत्र क्लेशनाशक है —
मानसिक पीड़ा, भय, तनाव और अंतर्द्वंद्व को शांत करने की शक्ति रखता है।
4️⃣ यह मंत्र गायत्री की तरह तीव्र नहीं, बल्कि कोमल और प्रेममय है —
इसलिए गृहस्थ, कलाकार, साधक, विद्यार्थी सभी के लिए उपयुक्त है।
5️⃣ यह मंत्र नाम-जप और भाव-जप दोनों में सिद्ध माना जाता है।
🌸 मंत्र जप के लाभ (Jap ke Fayde)
🧠 1️⃣ मानसिक लाभ
मन की चंचलता कम होती है
अनावश्यक विचारों में कमी आती है
गहरी शांति और स्थिरता अनुभव होती है
❤️ 2️⃣ भावनात्मक लाभ
भीतर दबा हुआ दर्द धीरे-धीरे हल्का होता है
अकेलेपन और खालीपन की भावना कम होती है
प्रेम, करुणा और स्वीकार का भाव बढ़ता है
🧘 3️⃣ आध्यात्मिक लाभ
श्रीकृष्ण से आंतरिक जुड़ाव गहरा होता है
भक्ति भाव सहज रूप से विकसित होता है
आत्मविश्वास और शरणागति का अनुभव होता है
🌿 4️⃣ जीवन में प्रभाव
कठिन परिस्थितियों में धैर्य बढ़ता है
निर्णय लेने की क्षमता शांत मन से आती है
जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि बनती है
⏱️ जप करने की विधि (संक्षेप में)
समय: प्रातः ब्रह्ममुहूर्त या रात्रि में
संख्या: 11, 27 या 108 बार
गति: धीमी, स्पष्ट उच्चारण के साथ
भाव: “मैं समर्पित हूँ” — बस यही भावना
🙏 निष्कर्ष (सार)
यह मंत्र मांगने का नहीं, मानने का मंत्र है।
जब साधक कुछ माँगता नहीं,
बल्कि स्वयं को सौंप देता है —
तभी भीतर का क्लेश स्वतः शांत होने लगता है।
यह मंत्र भगवान श्रीकृष्ण के पूर्ण स्वरूप को समर्पित होकर शरणागति और समर्पण का भाव जाग्रत करता है। इसका नियमित जप मन के क्लेश, भय, तनाव और अस्थिरता को शांत करता है, विचारों को एकाग्र करता है और भीतर गहरी शांति का अनुभव कराता है। यह हृदय में प्रेम, करुणा और स्वीकार की भावना बढ़ाता है, भावनात्मक दर्द को हल्का करता है तथा आत्मबल और आत्मविश्वास को मजबूत करता है। साधक का श्रीकृष्ण से आंतरिक जुड़ाव गहराता है, भक्ति सहज बनती है और जीवन की कठिन परिस्थितियों में धैर्य, संतुलन तथा सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है, जिससे मन, बुद्धि और भाव तीनों में सामंजस्य आता है।
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