पहाड़ों की अनूठी संस्कृति || ऋषि पंचमी || भुणजू || Brahmehwar Mahadev || Ancient Himalayan Culture
Автор: Brahmeshwar Mahadev
Загружено: 2024-09-09
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भूंजु से कुछ दिन पहले, ब्राह्मण परिवार की महिलाएँ मिट्टी को जमा करती हैं और उसमें जौ के बीज बोती हैं, जिसे यहाँ की भाषा में 'शकड़ी' कहा जाता है। इस प्रक्रिया के बाद, यह बर्तन मंदिर के स्थान पर रखा जाता है और प्रतिदिन इसकी पूजा की जाती है।
भूंजु के दिन, महिलाएँ पारंपरिक पोशाक 'रेजटा' पहनती हैं, सिर पर चुन्नी ओढ़ती हैं और शकड़ी को सजाकर पवित्र स्थान 'थड़ा' की ओर बढ़ती हैं, जो ब्रह्मेश्वर महादेव मंदिर के पीछे स्थित है।
इस दिन गाँव के लोग अपने पालतू जानवरों जैसे गाय, बछड़े, और बैलों की पूजा करते हैं। उनके गले में फूलों की माला डालते हैं। यह पर्व सिर्फ हमारे लिए नहीं, बल्कि हमारे पालतू जानवरों के लिए भी एक खास दिन है।"
ब्रह्मेश्वर महादेव का छत्र तैयार किया जाता है और पारंपरिक बाजा की धुनों के साथ इसे थड़ा तक ले जाया जाता है। यहाँ छत्र की पूजा सेरधारु परिवार के पुरोहित द्वारा की जाती है। शकड़ी को लेकर सभी महिलाएँ प्राकृतिक जल स्रोत की ओर जाती हैं। यहाँ पर जल लिया जाता है और शाकड़ी माता को उखाड़ा जाता है। इस प्रक्रिया के बाद, पहली शकड़ी को ब्रह्मेश्वर महादेव मंदिर में ले जाया जाता है, और फिर इसे एक-दूसरे में वितरित किया जाता है, क्योंकि यह पवित्र होती है। पारंपरिक ध्वनि पर ब्राह्मण महिलाएँ एक विशेष धुन पर नृत्य करती हैं। यह नृत्य उस संस्कृति की धरोहर है, जो सदियों से चली आ रही है।"
इस प्रकार भूंजु पर्व की समाप्ति होती है, लेकिन यह केवल एक त्योहार नहीं, हमारी संस्कृति का वह हिस्सा है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है। अगर आपको यह वीडियो पसंद आया हो, तो लाइक करें, कमेंट करें, और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें।
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