Bhajan.. "मैं अजन्मा मैं अकर्ता "beautifully sung by Mrs Parveen Sharma.(Description box)
Автор: Swami Shrikant Apte
Загружено: 2026-02-06
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Описание:
मैं अजनमा मैं अकर्ता मैं अनादि अनन्त हूँ
सर्व साक्षी सर्व व्यापी पूर्ण परमानन्द हूँ
मैं निरंजन मैं अलक्षण मैं विलक्षण तत्त्व हूँ
मैं अलिप्त निज स्वरूप सत्य चित् आनन्द हूँ
कर्म से या साधना से मैं न पकड़ा जाऊँ हूँ
निश्चित निर्द्वन्द हृदय में स्वयं ही आ जाऊँ हूँ
चेतना होकर बहिर्मुख ढूँढती मुझको फिरे
शांति और निश्चेष्ट में आना मुझको मिले
जो बने है सो मिटे है मैं कभी बनता नहीं
बनता मिटता जो दिखे आभास है वह मैं नहीं
आभास ही वृत्ति से मिलकर स्वप्न को सच मानता
आभास ही वृत्ति से हटकर सत्य को पहचानता
जन्म मृत्यु जरा व्याधि स्वप्न वत् हो जाए है
चेतना जाग कर स्वयं को ब्रह्म में ही पा जाए है
शब्द से निःशब्द में जब यह मनवा जाए है
बुद्धि भी संकल्प त्याग कर मौन हो जाए है
उन क्षणों में आत्मा परमात्मा मिल जाए है
चेतना चैतन्य का सब भेद ही खुल जाए है
ब्रह्म की लीला है यह ब्रह्म में होती सदा
ब्रह्म ही अपनी छवि निरखता रहता सदा
ब्रह्म होकर जीव जब ब्रह्म को है जानता
गुप्त होती बुद्धि तब मिट जाती सब अज्ञानता
माण्डूक्य उपनिषद सारे रहस्य को समझाए है
जो समझता रहस्य को वो परम पद पा जाए है
मैं अजनमा मैं अकर्ता मैं अनादि अनन्त हूँ
सर्व साक्षी सर्व व्यापी पूर्ण परमानन्द हूँ
भावार्थ (सरल अर्थ)
कवि आत्मा/ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन कर रहा है। आत्मा न जन्म लेती है, न कर्म करती है, न नष्ट होती है। वह साक्षी है, सर्वव्यापी है और आनन्दस्वरूप है।
कर्म, साधना या प्रयास से उसे पकड़ा नहीं जा सकता—जब मन शांत और निश्चल होता है, तब वह स्वयं प्रकट होती है।
जो कुछ बनता–बिगड़ता दिखता है, वह केवल आभास (माया) है। जब चेतना भ्रम से हटकर सत्य को पहचानती है, तब जन्म-मृत्यु, रोग और दुख स्वप्न जैसे प्रतीत होते हैं।
मन और बुद्धि जब मौन हो जाते हैं, तब आत्मा और परमात्मा का भेद मिट जाता है।
यह सब ब्रह्म की लीला है—ब्रह्म स्वयं को ही जीव रूप में जान रहा है।
माण्डूक्य उपनिषद इसी परम सत्य को समझाता है, और जो इसे जान लेता है, वही परम पद (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
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