कृष्ण 'पूर्णावतार' हैं, तो दुनिया उन्हें मानती क्यों नहीं? - OSHO|
Автор: Osho Hindi Discourse
Загружено: 2026-02-03
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अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि अगर कृष्ण 'पूर्णावतार' हैं, तो सभी विद्वान और संत उनके प्रति एकमत क्यों नहीं होते? ओशो इस वीडियो में एक कड़वा सच उजागर कर रहे हैं: "सयाने तो हमेशा एकमत होते हैं, केवल उनके पीछे चलने वाले अंधे अनुयायी आपस में लड़ते हैं।"
इस प्रवचन में ओशो मानव मनोविज्ञान (Psychology) के गहरे पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं:
प्रेम बनाम घृणा: हम अपने गुरु से प्रेम कम करते हैं, बल्कि दूसरे के गुरु से घृणा करने के लिए अपने गुरु को एक 'हथियार' की तरह इस्तेमाल करते हैं।
राजनीति का सूत्र: "दुश्मन का दुश्मन मित्र।" ओशो बताते हैं कि हमारा धर्म भी राजनीति की तरह हो गया है।
अखबार और युद्ध का रस: हमें शुभ खबरों में रुचि नहीं है; हमारा मन हत्या, दंगों और विवादों में ज्यादा एकाग्र (Concentrate) होता है।
धार्मिक बनाम साम्प्रदायिक: क्या मस्जिद जलाने वाला कभी मंदिर में प्रार्थना कर सकता है? ओशो बताते हैं कि असली धार्मिक व्यक्ति के लिए पूरा जगत ही परमात्मा का घर है।
पक्ष में होना प्रेम है, विपक्ष में होना घृणा।
अगर आप कृष्ण के पक्ष में होते, तो आप कृष्णमय हो गए होते।
धर्म जड़ों से स्वयं को बदल डालने की एक महाक्रांति है।
भगवान, कृष्ण पूर्णावतार कहे जाते हैं, पर सभी सयाने उनके प्रति एकमत क्यों नहीं हैं?
सयाने तो सभी एकमत हैं; सयानों के पीछे चलने वाले अनुयायी एकमत नहीं हैं। सयानों में तो कोई भेद नहीं है। अगर भेद हो तो वे सयाने ही नहीं हैं। लेकिन पीछे चलने वाले अनुयायी में बड़ा भेद पैदा हो जाता है। अनुयायी बिना भेद के जी ही नहीं सकता। अनुयायी को अपने गुरु को पकड़ने के लिए भी किसी का विरोध चाहिए।
इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी है।
तुम किसी व्यक्ति को प्रेम करते हो, यह तो एक बात हुई। और तुम किसी व्यक्ति को घृणा करते हो, कोई तुम्हारा दुश्मन है, तो दुश्मन का जो दुश्मन है उससे भी तुम प्रेम जतलाते हो; यह बड़ी दूसरी बात हुई। किसी से प्रेम होना एक बात है, दुश्मन के दुश्मन से प्रेम दिखलाना बिलकुल दूसरी बात है। पहली बात तो धर्म की है, दूसरी राजनीति की है। राजनीति का सूत्र ही यह है कि दुश्मन का दुश्मन अपना मित्र। उससे कोई मैत्री नहीं है, उससे कुल इतना ही संबंध है कि वह दुश्मन का दुश्मन है।
अगर तुम अपने गुरु को प्रेम करते हो, तब तो तुम्हें किसी और गुरु से तुलना करने का कोई सवाल नहीं। लेकिन तुम्हारे जीवन में प्रेम कम महत्वपूर्ण है, घृणा ज्यादा महत्वपूर्ण है। वस्तुतः तुम अपने गुरु को प्रेम कम करते हो, किसी और के गुरु को घृणा ज्यादा करते हो। उस घृणा के विपरीत ही तुम इस व्यक्ति के प्रेम में पड़ते हो। तुमने महावीर को नहीं चाहा है; तुमने कृष्ण को न चाहा होगा, इसलिए तुम महावीर को पकड़े हो; क्योंकि यह दृष्टि विपरीत मालूम होती है। तुमने कृष्ण को भी नहीं चाहा है; तुमने बुद्ध को न चाहा होगा, इसलिए तुम कृष्ण को पकड़े हो; क्योंकि बुद्ध की दृष्टि से कृष्ण विपरीत जाते मालूम पड़ते हैं।
तुम्हारे जीवन की धारा प्रेम से आंदोलित नहीं है, घृणा से आंदोलित है। इसीलिए जब भी तुम्हारे जीवन में घृणा को प्रकट करने का मौका होता है, तब तुम्हारे उत्साह की कमी नहीं होती। अगर कहीं कोई शुभ घटना घटती हो, तो तुम ध्यान ही नहीं देते। कहीं कोई अशुभ घटना घटती हो, तो तुम भीड़ बांध कर वहां खड़े हो जाते हो।
तुम अस्पताल जा रहे हो, पत्नी बीमार पड़ी है, बच्चा भूखा है, दवा लानी है, भोजन कमाना है, लेकिन अगर रास्ते पर दो लोग लड़ रहे हों, तो फिर तुम्हारे पैर नहीं बढ़ते। तुम खड़े होकर देख ही लेना चाहोगे। और अगर ऐसा हो जाए कि शोरगुल तो बहुत मचे, लड़ाई-झगड़ा हो न, गाली-गलौज बहुत हो और लोग बीच-बचाव कर दें, या लोग अलग हटा दें, तो तुम बड़े उदास मन से आगे बढ़ते हो कि कुछ हुआ ही नहीं। मन में बात छूट जाती है, जैसे कुछ होना था--छुरा चलता, खून बहता, तो जीवन में थोड़ी गति आ जाती।
युद्ध के समय इसलिए लोग बहुत ज्यादा ताजे, निखरे मालूम पड़ते हैं। जो कभी ब्रह्ममुहूर्त में नहीं उठते, वे भी ब्रह्ममुहूर्त में उठ कर अखबार खोजते हैं। जिनके जीवन में कुछ भी नहीं है, वे भी कहीं लाखों लोग मर रहे हैं, मारे जा रहे हैं, इससे आंदोलित हो जाते हैं। हर दस वर्षों में, मनस्विद कहते हैं, पृथ्वी पर एक बड़े युद्ध की जरूरत पड़ जाती है। क्योंकि लोग घृणा से जीते हैं। और अगर घृणा के निकलने का उपाय न हो तो लोगों के जीवन से रस खो जाएगा।
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