Detective Story | नीली स्याही का संकेत | महाकाल का ऋण | Detective Feluda Special
Автор: कहानी_Kotha
Загружено: 2026-01-30
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फ़रवरी का अंत है। कोलकाता का मौसम आजकल बड़ा अजीबोगरीब है। ठंड विदा तो ले चुकी है, पर वसंत की वह जानी-पहचानी ताज़गी अभी तक शहर पर पूरी तरह नहीं छा पाई है। 21 नंबर रजनी सेन रोड के हमारे बैठक (sitting room) में आज सुबह से ही एक भारी सन्नाटा पसरा हुआ है। फेलुदा पिछले चार दिनों से लगभग मौन व्रत धारण किए हुए है। जब वह किसी बहुत गहरी सोच में होता है या जब हाथ में कोई 'सॉलिड' केस नहीं होता, तो वह बिल्कुल पत्थर की मूर्ति जैसा बन जाता है।
सुबह से वह अपनी पसंदीदा आराम कुर्सी पर शरीर ढीला छोड़कर एकटक खिड़की के बाहर देख रहा है। बस कभी-कभी उसके दाहिने हाथ की उंगलियों के पोरों में दबी 'चारमीनार' का धुआँ छल्ले बनाकर ऊपर उठता है। फेलुदा जब धुआँ छोड़ता है, तब उसकी आँखों की पुतलियाँ स्थिर हो जाती हैं, मानो किसी अदृश्य भूलभुलैया का नक्शा उसकी आँखों के सामने तैर रहा हो।
मैं खिड़की के एक कोने में बैठकर सिद्धार्थ शंकर राय की लिखी अपराध विज्ञान (criminology) की एक किताब पलट रहा था। अचानक फेलुदा ने सन्नाटा तोड़ते हुए कहा, "तपेश, क्या तुम बता सकते हो कि 'समय' या 'काल' इंसान के लिए सबसे बड़ा रहस्य क्यों है?"
मैंने थोड़ा सकपकाते हुए पूछा, "क्यों फेलुदा?"
फेलुदा ने अब मेरी तरफ देखा। उसकी तीक्ष्ण बुद्धि से चमकती आँखों की पुतलियों को देख कर ऐसा लगा कि उसे किसी गहरे रहस्य की जड़ मिल गई है। "क्योंकि समय या काल सब कुछ मिटा देता है। लेकिन कभी-कभी उसी समय की कोख (गर्भ) से कुछ 'ऋण' (कर्ज़) जाग उठते हैं, जो इंसान को भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर देते हैं। अच्छा तोपसे, क्या तुम्हें पता है कि घड़ी के तेल की गंध साधारण तेल से कितनी अलग होती है? साधारण नारियल तेल के मुकाबले वह बहुत ज़्यादा तेज़ और कुछ-कुछ जले हुए धातु जैसी गंध वाली होती है।"
इससे पहले कि मैं कुछ जवाब देता, नीचे एक टैक्सी रुकने की आवाज़ सुनाई दी। थोड़ी ही देर में सीढ़ियों पर चप्पलों की जानी-पहचानी तेज़ और बेतरतीब आहट सुनाई दी—खट-खट-खट। दरवाज़ा खोलकर हमारे प्रिय लालमोहन बाबू उर्फ जटायु कमरे में दाखिल हुए। लेकिन आज उनके चेहरे पर वह चिर-परिचित 'गदगद' भाव नहीं था। उनका चेहरा पीला पड़ा हुआ था, रेशमी कुर्ता पसीने से तर-बतर था और उनकी वह हमेशा रहने वाली उलझन भरी मुस्कान आज नदारद थी।
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