प्राणधन! जीवन कुंज बिहारी (2/10)। Prandhan! Jeevaan Kunj Bihari (2/10)
Автор: Radha Govind Mandir, Chandigarh
Загружено: 2022-05-03
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💠 साधकों के आग्रह पर एवं सभी के आध्यात्मिक लाभ के दृष्टिगत हम अपने चैनल पर जगद्वन्द्य अपने गुरुदेव जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की अमूल्य प्रवचन श्रृंखलाओं को नियमित रूप से रिलीज़ करते जा रहे हैं।
इन प्रवचन श्रृंखलाओं में भक्ति विषयक अनेकानेक अस्पष्ट, अज्ञात, गूढ़ व उलझे हुये गंभीर विषयों का बड़ी सरलता एवं स्पष्टता के साथ निरूपण किया गया है जिनके श्रवण से विभिन्न आध्यात्मिक गुत्थियाँ सुलझ जातीं हैं तथा अनेकानेक भ्रान्तियों का स्वतः निराकरण हो जाता है।
इसी क्रम में एक नई प्रवचन श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है— 'प्राणधन जीवन कुंज बिहारी'। दस अद्भुत प्रवचनों की यह श्रृंखला श्री महाराज जी द्वारा विरचित अलौकिक ग्रन्थ 'प्रेम रस मदिरा' के एक पद (३.६४) की व्याख्या पर आधारित है।
कुंज बिहारी श्रीकृष्ण वास्तव में कौन हैं, उनकी प्राप्ति ही जीवमात्र का स्वाभाविक लक्ष्य क्यों है, श्रीकृष्ण से हमारा संबंध किस प्रकार का है तथा हम अपने सनातन संबंधी श्रीकृष्ण को क्यों भूले हुये हैं? प्रेम का स्वरूप क्या है, निष्काम प्रेम की कसौटी क्या है, प्रेम की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त करने हेतु भक्ति मार्ग के साधक को कैसा आदर्श सामने रखकर आगे बढ़ना चाहिये, शरणागति का रहस्य, शरणागति में बाधा इत्यादि अनेक अमूल्य विषयों की अति स्पष्ट व्याख्या हमें इस प्रवचन श्रृंखला में प्राप्त होती है।
यह प्रवचन श्रृंखला भगवत्प्रेमपिपासुओं के लिये अनमोल निधि है। इसमें उस 'गोपी प्रेम' की प्राप्ति का निरूपण है जिसके लिये लालायित होकर भगवान शंकर भी गोपी वेश धारण कर ब्रज में डोलते हैं। आध्यात्मिक जगत के गूढ़तम रहस्यों को उद्घाटित करने वाली इस विशेष प्रवचन श्रृंखला को आप एक बार तो आद्योपान्त अवश्य ही सुनें।
ये व्याख्यान सन् 1981 के हैं तथा इनकी वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं है, केवल ऑडियो रिकॉर्डिंग ही प्राप्त है। श्रोताओं के विशेष लाभ के दृष्टिगत हम उसी दुर्लभ ऑडियो को यहाँ वीडियो के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। सभी से अनुरोध है कि आप इस परम उपयोगी श्रृंखला का एकाग्रचित्त होकर श्रवण करें एवं अधिकाधिक लाभ प्राप्त करें। 💠
📼इस वीडियो के कुछ अंश हैं—
इस पद की व्याख्या में पिछले दिन ये बताया गया था जो अज्ञानी स्वयं को देह मानता है वो संसार को अपना मानता है। और जो स्वयं को आत्मा मानता है वो ज्ञानी है और वो श्याम सुन्दर को ही अपना मानता है। अनादिकाल से अब तक मैंने अपने आपको आत्मा नहीं माना। अर्थात् जो हमारा ओरिजनल रूप है, ये जीव ईश्वर का अंश है, ईश्वर का दास है और सनातन है। यह बात मैंने अनादिकाल से अब तक अनंत बार सुनकर भी नहीं मानी। बहुत कुछ सुना, बहुत कुछ पढ़ा, सदा सर हिलाते रहे और ये कहते भी रहे समझ गए, समझ गए! किन्तु माना नहीं। और इसलिए नहीं माना कि संसार को इतना अधिक अपना मान चुके है कि वो अभ्यास छूट नहीं रहा है ये गड़बड़ है। ऐसी बात नहीं है जो हमारी सिद्ध हो कि गधों को अपना मान लें और जो अपना हो उसको अपना न माने। किन्तु इतना अधिक अभ्यास हो चुका है सब कुछ जानते हुए भी नहीं मानते। ये दुर्दैव है, दुर्भाग्य है। गौरांग महाप्रभु ने इसके लिए और कोई शब्द नहीं रखा। उन्होंने कहा- क्या कहे? दुर्भाग्य ही है जी उनका। अनंत बार संत मिले, भगवान मिले, शास्त्र-वेद का श्रवण किया, पठन किया। कितने बार तो हमलोगों ने वेदों के भाष्य किए आप सब लोगों ने। जब हम हजारों, लाखों, करोड़ों बार इंद्र बन चुके है तो क्या नहीं किया होगा? क्या नाॅलेज नहीं रही होगी हमारे पास? किन्तु बस एक काम नहीं किया। श्याम सुन्दर को अपना नहीं माना। और उसका रीजन मैंने आपको बताया आप भूले नहीं कि हमने अनादिकाल से अब तक जो अनवरत चिंतन द्वारा अपना माना है वही चिंतन हमारे लिए बाधक बन रहा है।
—जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज
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कलियुग में दान को ही कल्याण का एकमात्र माध्यम बताया गया है। 'दानमेकं कलौयुगे'।
दान पात्र के अनुसार ही अपना फल देता है तथा भगवान एवं महापुरुष के निमित्त किया गया दान सर्वोत्कृष्ट फल प्रदान करता है।
हम साधारण जीव यथार्थ में यह नहीं जान सकते कि वास्तविक महापुरुष के प्रति किया गया हमारा दान/समर्पण हमारे कल्याण का कैसा अद्भुत द्वार खोल देगा। अतएव, समर्पण हेतु आगे बढिये।
आपकी यह दान राशी जीरकपुर (चंडीगढ़) स्थित राधा गोविंद मन्दिर के निर्माण कार्य में प्रयुक्त होगी।
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