📜 गुरु गोरखनाथ जी की ज्ञान गोदड़ी | Gyan Godri Path | श्री नाथ रहस्य | Guru Yogi Vilasnath Ji
Автор: DR VLOG
Загружено: 2026-01-21
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आदेश आदेश! 🙏
इस वीडियो में प्रस्तुत है गुरु गोरखनाथ जी की पवित्र "ज्ञान गोदड़ी" (Gyan Godri) का सम्पूर्ण संगीतमय पाठ। यह पाठ साधक को शरीर और ब्रह्मांड के रहस्य को समझने में मदद करता है और आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।
📚 ग्रन्थ सन्दर्भ (Reference):
यह दुर्लभ और पवित्र पाठ 'श्री नाथ रहस्य' (Shri Nath Rahasya) ग्रन्थ से लिया गया है।
✍️ रचयिता: अखिल भारतवर्षीय अवधूत भेष बारह पंथ योगी महासभा के अध्यक्ष गुरु योगी विलासनाथ जी महाराज (Guru Yogi Vilasnath Ji Maharaj)।
हम गुरु जी के चरणों में नमन करते हैं जिन्होंने इस गुप्त ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाया।
📜 ज्ञान गोदड़ी (सम्पूर्ण पाठ) - Lyrics:
[भाग १: सृष्टि और काया]
सत नमो आदेश । गुरु जी को आदेश । ॐ गुरु जी ।
नाथ कहे दोऊ कर जोरी, यह संशय मेटो प्रभु मोरी ।
काया गोदड़ी का विस्तारा, तां से हो जीवन निस्तारा ।
आदि पुरुष इच्छा उपजाई, इच्छा सख्त निरंजन मांही ।
इच्छा ब्रह्मा विष्णु महेश, इच्छा शारद गौरी गणेशा ।
इच्छा से उपजा संसारा, पांच तत्व गुण तीन पसारा ।
अलख पुरुष जब किया विचारा, लक्ष चौरासी धागा डारा ।
पांच तत्व की गोदड़ी बीनी, तीन गुणों से ठाड़ी कीनी ।
तां मैं जीव ब्रह्म है माया, सतगुरु ऐसा खेल बनाया ।
सीवन पांच पच्चीस सो लागे, काम क्रोध मद मोह त्यागे ।
अब काया गोदड़ी का विस्तारा, देखो संतो अगम अपारा ।
[भाग २: योग साधना]
चन्द्र सूर्य दोउ चंदोआ लागे, गुरु प्रताप से सोवत जागे ।
शबद की सुई सुरति का डोरा, ज्ञान का टोपा निरंजन ओढ़ा ।
इस गोदड़ी की कर होशियारी, दाग न लागे देख विचारी ।
सुमति के साबुन सतगुरु धोई, कुमति के मैल को डारे खोई ।
जिन गुदड़ी का किया विचारा, उनको भेंटे सिरजन हारा ।
धीरज धूनी ध्यान धर आसन, जतकि कोपीन सत्य सिंहासन ।
युक्ति कमण्डल कर गहे लीना, प्रेम फावड़ी सतगुरु चीना ।
सेली शील विवेक की माला, दया की टोपी तन धर्मशाला ।
मेहर मतंगा मति व साखी, मृगछाला मन ही की राखी ।
निष्ठा धोती पवन जनेऊ, अजपा जपा सो जाने भेऊ ।
रहे निरन्तर सदगुरु दाया, साधो की संगत से कुछ पाया ।
लय की लकुटी हृदय की झोली, क्षमा खड़ाऊं पहिर बहोरी ।
मुक्ति मेखला सुकृत सुमिरनी, प्रेम प्याला पील मौनी ।
दास कूबरी कलह निबारी, ममता कुत्ती को ललकारी ।
यतने जंजीर बान्ध जो राखे, अगम अगोचर खिड़की लाखे ।
वीतराग वैराग्य निधाना, तत्व तिलक दीनों निर्वांना ।
गुरु गम चकमक मन सम तूला, ब्रह्म अग्नि प्रगट भई मूला ।
संशय शोक सकल भ्रम जारे, पांच पच्चीसों प्रगट मारे ।
दिल के दर्पन दुविधा धोई, सो योगेश्वर पक्का होई ।
सुन्न महल की फेरी देई, अमृत रस की भिक्षा लेई ।
सुख दुख मेला जग का भावे, त्रिवेणी के घाट नहावे ।
[भाग ३: फलश्रुति]
तन मन खोज भया जब ज्ञाना, तब लख पावे पद निर्वांना ।
अष्ट कमल दल चक्र सूझे, योगी आप-आप मैं बूझे ।
इड़ा पिंगला के घर जाई, सुषुम्ना नीर रहा ठहराई ।
ॐ सोहं तत्व विचारा, बंक नाल में किया संभारा ।
मनसा मार्ग गगन चढ़ जाई, मानस सरोवर बैठ नहाई ।
छूट गई कलमष मिले अलेखा, इन नैनो से अलख को देखा ।
अहंकार अभिमान विदारा, घट में चौका किया उजियारा ।
श्रद्धा चंवर प्रीति की धूपा, निष्ठा नाम गुरु का रुपा ।
अनहद नाद नाम की पूजा, ब्रह्म वैराग्य नहीं दूजा ।
चित्त की चन्दन तुलसी फूला, हित का सम्पुट करले मूला ।
गोदड़ी पहरी आप अलेखा, जिसने चलाया प्रगट भेष ।
जो गोदड़ी को पढ़े प्रभाता, जन्म-जन्म का पातक जाता ।
जो गोदड़ी पढ़े मध्याना, सो नर पावे पद निर्वांना ।
सन्ध्या सुमिरण जो नर करे, जरा मरण भव सागर तरे ।
जो गोदड़ी की निन्दा करें, षट दर्शन से वह नर टरे ।
कहे मत्स्येन्द्र सुनो गोरखनाथ, ज्ञान गोदड़ी करे प्रकाश ।
इति गुरु गोरखनाथ जी की ज्ञान गोदड़ी सम्पूर्ण भया ।
श्री नाथ जी गुरु जी को आदेश । आदेश ।
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