BG 11.53 श्रीमद भगवद गीता यथारूप अध्याय 11 श्लोक-53 - भगवान् का सुदुर्लभ रूप
Автор: Rupanuga Das
Загружено: 2026-01-29
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Gita Class Chapter 11 Shloka 53 BG Class 11.53 भगवान् ने भय भीत अर्जुन के भय को दूर करने के लिए क्या किया ?
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11.53
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया |
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा || ५३ ||
न - कभी नहीं; अहम् - मैं; वेदैः - वेदाध्ययन से; न - कभी नहीं; तपसा - कठिन तपस्या द्वारा; न - कभी नहीं; दानेन - दान से; च - भी; इज्यया - पूजा से; शक्यः - संभव है; एवम् -विधः - इस प्रकार से; द्रष्टुम् - देख पाना; दृष्टवान् - देख रहे; असि - तुम हो; माम् - मुझको; यथा - जिस प्रकार |
भावार्थ
तुम अपने दिव्य नेत्रों से जिस रूप का दर्शन कर रहे हो, उसे न तो वेदाध्ययन से, न कठिन तपस्या से, न दान से, न पूजा से ही जाना जा सकता है | कोई इन साधनों के द्वारा मुझे मेरे रूप में नहीं देख सकता |
तात्पर्य
कृष्ण पहले अपनी माता देवकी तथा पिता वासुदेव के समक्ष चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए थे और तब उन्होंने अपना द्विभुज रूप धरान किया था | जो लोग नास्तिक हैं या भक्तिविहीन हैं, उनके लिए इस रहस्य को समझ पाना अत्यन्त कठिन है | जिन विद्वानों ने केवल व्याकरण विधि से या कोरी शैक्षिक योग्यताओं के आधार पर वैदिक साहित्य का अध्ययन किया है, वे कृष्ण को नहीं समझ सकते | न ही वे लोग कृष्ण को समझ सकेंगे, जो औपचारिक पूजा करने के लिए मन्दिर जाते हैं | वे भले ही वहां जाते रहें, वे कृष्ण के असली रूप को नहीं समझ सकेंगे | कृष्ण को तो केवल भक्तिमार्ग से समझा जा सकता है, जैसा कि कृष्ण ने स्वयं अगले श्लोक में बताया है |
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