कमियां ही मेरा वजूद हैं | कहते हैं मुझमें कमियाँ बहुत हैं,मैं कहता हूँ—हाँ, बेशुमार हैं!
Автор: अमृतकाव्य
Загружено: 2026-02-20
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अक्सर दुनिया हमें बदलने की कोशिश करती है, हमें 'पूर्ण' बनाना चाहती है। पर क्या हमारी कमियां ही वो धागा नहीं हैं जो हमें अपनों से जोड़कर रखती हैं? आज की कविता "अमृतकाव्य" पर इसी गहरे अहसास को बयां करती है कि कैसे हमारी असफलताओं ने हमें गढ़ा है, और क्यों हम सफलता की चमक में अपनी सादगी खोने से डरते हैं।
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