☸️ तथागत भगवान बुद्ध सदा सहाय रहेंगे सुबह उठते ही रोज़ सुनें ये भजन ~ Best Dhamma Geet
Автор: Buddha Kripa (बुद्ध कृपा)
Загружено: 2026-02-24
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तथागत भगवान गौतम बुद्ध, जिन्हें सिद्धार्थ गौतम के नाम से भी जाना जाता है, मानव इतिहास के महानतम आध्यात्मिक गुरुओं में से एक थे। उनका जन्म लगभग 563 ईसा पूर्व लुंबिनी (आज का नेपाल) में हुआ था। उनके पिता राजा शुद्धोधन शाक्य गणराज्य के राजा थे और माता महामाया थीं। जन्म के सात दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया, और उनका पालन-पोषण उनकी मौसी महाप्रजापति गौतमी ने किया।
राजकुमार सिद्धार्थ बचपन से ही अत्यंत शांत, संवेदनशील और करुणामय स्वभाव के थे। राजमहल में उन्हें हर प्रकार का सुख-सुविधा प्राप्त था, लेकिन उनका मन सांसारिक भोग-विलास में नहीं रमता था। वे अक्सर जीवन के रहस्यों और मानव दुखों के विषय में चिंतन करते रहते थे।
एक दिन जब वे रथ पर नगर भ्रमण के लिए निकले, तो उन्होंने चार दृश्य देखे—एक वृद्ध व्यक्ति, एक रोगी, एक मृत शरीर और एक संन्यासी। इन दृश्यों ने उनके मन को गहराई से झकझोर दिया। उन्होंने समझा कि संसार में जन्म, जरा, रोग और मृत्यु अटल सत्य हैं। तब उनके मन में प्रश्न उठा—“क्या इन दुखों से मुक्ति का कोई मार्ग है?”
29 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को छोड़कर गृहत्याग किया। इसे “महाभिनिष्क्रमण” कहा जाता है। इसके बाद उन्होंने कई वर्षों तक कठोर तपस्या और ध्यान किया, परंतु अत्यधिक कष्ट देने वाली तपस्या से भी उन्हें सत्य की प्राप्ति नहीं हुई। तब उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाया—न तो अत्यधिक भोग, न ही अत्यधिक तप।
बोधगया में निरंजना नदी के तट पर एक पीपल के वृक्ष (बोधि वृक्ष) के नीचे गहन ध्यान में लीन होकर उन्होंने 35 वर्ष की आयु में ज्ञान प्राप्त किया। उसी क्षण वे “बुद्ध” कहलाए, जिसका अर्थ है—जाग्रत या ज्ञान प्राप्त पुरुष।
ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने सारनाथ में अपना प्रथम उपदेश दिया, जिसे “धर्मचक्र प्रवर्तन” कहा जाता है। उन्होंने चार आर्य सत्य बताए—
जीवन दुखमय है।
दुख का कारण तृष्णा है।
दुख का निरोध संभव है।
दुख निरोध का मार्ग अष्टांगिक मार्ग है।
अष्टांगिक मार्ग में सम्यक दृष्टि, संकल्प, वाणी, कर्म, आजीविका, प्रयास, स्मृति और समाधि शामिल हैं।
बुद्ध ने अहिंसा, करुणा, मैत्री, ध्यान और आत्मसंयम पर विशेष बल दिया। उन्होंने जाति-पांति और ऊँच-नीच का विरोध किया तथा सभी मनुष्यों को समान बताया। उनका संदेश सरल था—मन को शुद्ध करो, सत्य का अनुसरण करो और करुणा का जीवन जियो।
उन्होंने कहा—
“मन ही सब कुछ है। आप जो सोचते हैं, वही बन जाते हैं।”
80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में उन्होंने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। आज भी बुद्ध की शिक्षाएँ विश्वभर में करोड़ों लोगों को शांति, संतुलन और आत्मज्ञान का मार्ग दिखा रही हैं। बौद्ध धर्म भारत से निकलकर एशिया के अनेक देशों और विश्व के विभिन्न भागों में फैल चुका है।
भगवान बुद्ध का जीवन त्याग, सत्य की खोज और मानव कल्याण का अद्वितीय उदाहरण है। 🌼🙏
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