उज्जैन की शिप्रा नदी औऱ रामघाट का इतिहास।History of Shipra River and Ramghat of Ujjain
Автор: Indian Desi Traveller
Загружено: 2020-08-12
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उज्जैन की शिप्रा नदी औऱ रामघाट का इतिहास।History of Shipra River and Ramghat of Ujjain
बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन उज्जैन में बहने वाली शिप्रा नदी, जहां पर हर 12 वर्ष बाद सिंहस्थ कुंभ का आयोजन किया जाता है।जी हां कुंभ विश्व का सबसे बड़ा मेला है। एक कथा के अनुसार शिप्रा नदी विष्णु जी के रक्त से उत्पन्न हुई थी। ब्रह्म पुराण में भी शिप्रा नदी का उल्लेख मिलता है।
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शिप्रा नदी की उत्पत्ति के बारे में हिन्दू धर्मग्रंथों में एक पौराणिक कथा का उल्लेख मिलता है। बहुत समय पहले भगवान शिव ब्रह्म कपाल लेकर, भगवान विष्णु से भिक्षा मांगने के लिए पहुंचे। भगवान विष्णु ने तब उन्हें अंगुली दिखाते हुए भिक्षा प्रदान की। इससे भगवान भोलेनाथ नाराज हो गए और उन्होंने तुरंत अपने त्रिशूल से विष्णु जी की उस अंगुली पर प्रहार कर दिया।और अंगुली से रक्त की धारा बह निकली।
जो विष्णुलोक से सीधे धरती पर आ पहुंची। और इसी तरह यह रक्त की धार, शिप्रा नदी में परिवर्तित हो गई।
क्षिप्रा नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के महू छावनी से लगभग 17 किलोमीटर दूर जानापाव की पहाडिय़ों से माना गया है। और इसके साथ ही यह स्थान भगवान विष्णु के अवतार भगवान परशुराम का जन्म स्थान भी माना गया है। भौगोलिक घटनाओं के अनुसार कहा जाता है कि उत्तर में पहाड़ है , जहां किसी भी नदी का विपरीत दिशा में बहना असंभव है , मगर शिप्रा नदी उत्तर दिशा की ओर बहती है ओर आगे जाकर यह नदी नर्मदा में मिल जाती हैं।
शिप्रा नदी के किनारे पर स्थित घाटों का भी पौराणिक महत्व है। जिनमें से यह रामघाट एक मुख्य घाट माना जाता है।यह सबसे प्राचीन स्नान घाट है, जिस पर कुम्भ मेले के दौरान श्रद्धालु स्नान करना अधिक पसन्द करते हैं।
यह घाट हरसिद्धि मंदिर के समीप स्थित है।
ऐसा कहा जाता हैं कि प्राचीन भारतीय साहित्य परवर्ती काल में रामचन्द्र बाबा शेणवी ने अठारहवीं शती के पूर्वार्ध में शिप्रा तट पर महाकाल के वर्तमान मन्दिर सहित विभिन्न मंदिर और रामघाट तथा नृसिंह घाट आदि का निर्माण अथवा जीर्णोद्वार करवाया।
ऐसा कहा जाता हैं की भगवान श्रीराम ने स्वयं यहाँ आकर अपने पिता दशरथ का श्राद्धकर्म और तर्पण इसी घाट पर किया था।
इसके अलावा भी रामघाट पर कई आयोजन होते हैं सावन महीने में भक्तों के जनसैलाब सहित चांदी की पालकी में बाबा महाकाल की सवारी नगर भ्रमण करने के पश्चात इसी घाट पर पहुंचती है यहाँ पर बाबा महाकाल का अभिषेक करवाया जाता हैं।
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