A HISTORICAL STORY OF HIJLA MELA || LUCKY SANTOSH
Автор: Lucky Santosh Official
Загружено: 2025-02-24
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3 फरवरी सन 1890 ई0 को तत्कालीन अंग्रेज जिलाधिकारी जॉन राबटर्स कास्टेयर्स के समय हिजला मेला की शुरुआत की गई थी । ऐसा माना जाता है कि स्थानीय परंपरा, रीति-रिवाज एवं सामाजिक नियमन को समझने तथा स्थानीय लोगों से सीधा संवाद स्थापित करने के उद्देश्य से मेला की शुरुआत की गई । इसी संदर्भ में “हिजला” शब्द की व्युत्पत्ति भी “हिज लॉज़” से मानी जाती है। एक मान्यता यह भी है कि स्थानीय गाँव हिजला के आधार पर हिजला मेला का नामकरण किया गया है। वर्ष 1975 में संताल परगना के तत्कालीन आयुक्त श्री जी0 आर0 पटवर्धन की पहल पर हिजला मेला के आगे जनजातीय शब्द जोड़ दिया गया । झारखण्ड सरकार ने इस मेला को वर्ष 2008 से एक महोत्सव के रुप में मनाने का निर्णय लिया तथा 2015 में इस मेला को राजकीय मेला का दर्जा प्रदान किया गया, जिसके पश्चात यह मेला राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव के नाम से जाना जाता है ।
सामान्यतः यह मेला माघ- फाल्गुन के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है। इस समय तक ग्रामीण कृषि कार्यों से निवृत होकर उल्लास-उत्सव की मनोदशा में रहते हैं। सोहराय पर्व की पृष्टभूमि, बसंती हवा की पुलक तथा फाल्गुनी छटा के अवतरण के मध्य संपूर्ण प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत सातत्यता के साथ पूरे आन-बान-शान से परिलक्षित होता है। यह मेला न केवल जनजातीय समुदायों अपितु स्थानीय गैर-जनजातीय समुदायों की सांझी विरासत का अदभुत समन्वय का दर्शन कराता है। त्रिकुट पर्वत से निकलने वाली मयुराक्षी नदी तथा पर्वत पठारों के मध्य हिजला मेला की अवस्थिति इसे अनूठा सौंदर्य प्रदान करता है। नदी की कल-कल धारा, पक्षियों की कलरव, चह-चहाहट के मध्य मांदर, ढोल, ढ़ाक, झांझ, झांझर की धुन पर थिरकते मानव-वृंद अनायास ही सभी को झूमने के लिए मजबूर कर देती हैं। मानो प्रत्येक व्यक्ति और प्रकृति के कण-कण में हिजला का स्पंदन व्याप्त हो गया हो ।
हिजला मेला विविधता से भरपूर है। जहाँ एक ओर जनजातीय संस्कृति, नृत्य-संगीत का प्रदर्शन होता है, वहीं दूसरी ओर भीतरी कला मंच पर दिन भर बच्चों का क्विज , संभाषण, वाद-विवाद प्रतियोगिता एवं बुद्धिजीवियों के मध्य परिचर्चा का आयोजन, रात्री में कॉलेज विद्यार्थियों के द्वारा पारंपारिक कथानकों का मंचन, बाहरी कला मंच पर सांस्कृतिक दलों के मध्य प्रतियोगिता तथा सांस्कृतिक संध्या जिसमें राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर के कलाकारों का प्रदर्शन, खेल-कूद प्रतियोगिता के साथ-साथ पुस्तक, खानपान, मनोरंजन, पशु आदि से संबंधित खण्ड में दुकाने लगायी जाती है। सरकार की विभिन्न योजनाओं से रुबरु कराने के उद्देश्य से विभागों के द्वारा स्टॉल लगाये जाते हैं, तो किसानों को आधुनिक तकनीक से अवगत कराने के लिए कृषि, आत्मा, उद्यान तथा मत्स्य पदाधिकारीयों के द्वारा प्रत्यक्षण कराया जाता है।
यदि आप लोक-संस्कृति और लोक गीत-संगीत को करीब से महसूस करना चाहते है, यदि आप प्रकृति में विद्यमान शाश्वत संगीत और उसके लय की अनुभूति करना चाहते है, यदि आप लोक मंगल समरसता में डूबना चाहते हैं तो आपको एक बार हिजला मेला जरुर आना चाहिए ।
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