Makar lagna main guru ka phal- Jupiter in Capricorn - गुरु का फल- Jupiter transit
Автор: ASTROLOGY LOGICS
Загружено: 2021-09-29
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भारत देश में प्रचलित पौराणिक ज्योतिष मान्यताओं में वृहस्पति को देवगुरु की उपाधि प्राप्त है। स्वभाव से साधू देव गुरु धनु व् मीन राशि के स्वामी हैं जो कर्क में उच्च व् मकर राशि में नीच के माने जाते हैं । मकर लग्न की कुंडली में गुरु तृतीयेश , द्वादशेश होकर एक मारक गृह के रूप में मान्य हैं । इस लग्न कुंडली के जातक को किसी भी सूरत में गुरु रत्न पुखराज धारण नहीं करना है । आपको बताते चलें की जन्मपत्री के उचित विश्लेषण के बाद ही उपाय संबंधी निर्णय लिया जाता है की उक्त ग्रह को रत्न से बलवान करना है , दान से ग्रह का प्रभाव कम करना है , कुछ तत्वों के जल प्रवाह से ग्रह को शांत करना है या की मंत्र साधना से उक्त ग्रह का आशीर्वाद प्राप्त करके रक्षा प्राप्त करनी है आदि । मंत्र साधना सभी के लिए लाभदायक होती है । आज हम मकर लग्न कुंडली के १२ भावों में देवगुरु के शुभाशुभ प्रभाव को जानने का प्रयास करेंगे …
मकर लग्न – प्रथम भाव में गुरु – Makar Lagan – Gurul pratham bhav me :
कुम्भ राशि गुरु की नीच राशि है , प्रथम भाव में गुरु के आने से जातक का स्वास्थ्य उत्तम नहीं रहता है । गुरु की महादशा में संतान सम्बन्धी समस्या लगी रहती है , दाम्पत्य जीवन में समस्याएं आती है और साझेदारी के काम से हानि का योग बनता है । जातक का भाग्य साथ नहीं देता है । यदि विदेश यात्राएं हों तो भी कम ही लाभान्वित हो पाता है ।
मकर लग्न – द्वितीय भाव में गुरु – Makar Lagan – Guru dwitiya bhav me :
तृतीयेश , द्वादशेश गुरु यदि द्वितीय भाव में स्थित हों तो जातक के विदेश सेटेलमेंट में सहायक रहते हैं । इसके साथ ही ऐसे जातक को परिवार कुटुंब का साथ नहीं मिलता है । गुरु की महादशा में जातक के परिवार में धन के आगमन में समस्याएं आती हैं । प्रोफेशनल लाइफ में व् छोटे भाई बहन को परेशानी लगी रहने की संभावना निर्मित होती है ।
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