डॉ. रक्षा मेहता : क से कविता - हैदराबाद: जब कभी भी मैं अकेला होता हूं: कवि - अज्ञात
Автор: क से कविता
Загружено: 2026-02-17
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जब कभी भी मैं अकेला होता हूँ
तुम मेरे पास होती हो
जैसे किसी ठंडी गुफा में जलता हुआ दीया
जैसे किसी सूने जंगल में महकता हुआ फूल
जैसे किसी लंबी राह में बरगद की ठंडी छाँव
जैसे किसी प्यासे को अचानक मिल जाए जल
जब दुनिया के शोर शराबे में मेरा दम घुटने लगता है
जब भीड़ में भी मैं ख़ुद को अकेला पाता हूँ
तब तुम्हारी स्मृतियों की धीमी-धीमी गुनगुनाहट
मेरे कानों में संगीत की तरह बजने लगती है
तुम मेरे पास होती हो कभी एक विचार बनकर
कभी एक सपने की तरह
कभी हवा के एक ठंडे झोंके की तरह
जो मेरे माथे को चूम ले
दुनिया कहती है तुम दूर हो
पर मेरी रूह जानती है
कि तुम मेरे पास होती हो
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