आत्मा ही जगत है – Atma Hi Jagat |
Автор: Ashutosh Mishra
Загружено: 2026-03-16
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आत्मा ही जगत है” एक शक्तिशाली आध्यात्मिक भजन है, जो अष्टावक्र गीता के अध्याय ४ के गहरे दर्शन पर आधारित है। राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के संवाद से प्रेरित यह भजन अद्वैत वेदांत के सार को सरल, संगीतमय, और हृदयस्पर्शी शैली में प्रस्तुत करता है।
“आत्मैव जग, जगत आत्म है” की यह रचना कहरवा ८‑बीट पर आधारित है, जिसमें धुआँ–आकाश, तरंग–सागर, और इच्छा–द्वेष जैसे अलंकारयुक्त बिम्बों के ज़रिये यह संदेश दिया गया है कि आप विचारों और भावनाओं के साक्षी हैं, उनमें डूबे हुए नहीं।
यह भजन ध्यान, सत्संग, योग, और आत्म‑प्रेरणा के लिए उपयुक्त है। हर सुनने वाले को यह याद दिलाता है कि “मैं देह नहीं, मैं नूर हूँ।”
🎵 राग भाव: मिश्र भैरवी
🥁 ताल: कहरवा ८ मात्रा
📖 आधार: अष्टावक्र गीता अध्याय ४
✍️ शैली: माधव शरण प्रेरित, हिंगलिश भजन
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