होली के पावन अवसर पर तेले तप की भव्य मांगलिक साध्वी डॉ. शैली जी म. के मुखारविंद से
Автор: Shivajay vani
Загружено: 2026-03-03
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आत्मशुद्धि और तप की अद्भुत साधना
होली के पावन अवसर पर तेले तप की अत्यंत मंगलमयी मांगलिक सम्पन्न हुई।
इस मांगलिक अवसर पर एक भावपूर्ण भजन भी प्रस्तुत किया गया —
“वीर प्रभुजी मोरी रंग दचदरिया…”
इस भजन का सुंदर भाव यह है कि सच्ची होली तब होती है जब आत्मा भगवान के रंग में रंग जाती है। संसार के अन्य रंग तो समय के साथ फीके पड़ जाते हैं, परंतु भगवान का रंग ऐसा है जो एक बार चढ़ जाए तो कभी फीका नहीं पड़ता।
तप, संयम और भक्ति के माध्यम से भगवान के रंग में रंगना ही वास्तविक होली की आराधना है। यही इस भजन का गहरा आध्यात्मिक संदेश है।
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