जैसे
Автор: Ashtavakra Gita Gyan
Загружено: 2026-01-25
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Описание:
हम संसार को
अलग–अलग टुकड़ों में देखते हैं—
मैं यहाँ हूँ,
दुनिया बाहर है।
लेकिन यह श्लोक
एक बहुत ही सरल और मधुर उदाहरण से
इस भ्रम को तोड़ देता है।
जैसे शक्कर
गन्ने के रस से ही बनती है
और उसी रस से पूरी तरह भरी होती है,
वैसे ही यह पूरा संसार
उसी चेतना में उत्पन्न हुआ है
और उसी से निरंतर व्याप्त है।
नाम और रूप अलग दिखते हैं,
लेकिन तत्व एक ही है।
जब यह बात
सिर्फ़ समझ नहीं,
बल्कि देखने का ढंग बन जाती है,
तो जीवन से संघर्ष कम होने लगता है।
पकड़ ढीली पड़ती है,
डर हल्का होता है,
और भीतर एक गहरी, स्थिर शांति
स्वाभाविक रूप से प्रकट होती है।
यह वीडियो
किसी दर्शन को थोपने के लिए नहीं,
बल्कि देखने की दृष्टि को
नरमी से मोड़ने का प्रयास है।
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