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साधारणीकरण और व्यक्ति-वैचित्र्यवाद | आचार्य रामचंद्र शुक्ल निबंध | चिंतामणि

Автор: Hindi Sahitya with Raja

Загружено: 2026-01-27

Просмотров: 17

Описание: साधारणीकरण और व्यक्ति-वैचित्र्यवाद | आचार्य रामचंद्र शुक्ल निबंध | चिंतामणि

पूरे निबंध का pdf:-
https://drive.google.com/file/d/1CGyE...


यह video आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित है, जो 'साधारणीकरण' और 'व्यक्ति वैचित्र्यवाद' के सिद्धांतों की विस्तृत व्याख्या और तुलना करता है।

साधारणीकरण (Generalization):

परिभाषा और सिद्धांत: सच्चे काव्य का विषय वह होता है जो केवल किसी व्यक्ति विशेष के हृदय से नहीं, बल्कि मनुष्य-मात्र की भावात्मक सत्ता पर प्रभाव डाले। जब किसी भाव का विषय इस रूप में प्रस्तुत होता है कि वह सामान्यतः सबके लिए उसी भाव का आलंबन हो सके, तो इसे 'साधारणीकरण' कहते हैं।


लोक-हृदय की पहचान: सच्चा कवि वही है जिसे लोक-हृदय की पहचान हो और जो अनेक विचित्रताओं के बीच मनुष्य जाति के सामान्य हृदय को देख सके। इसी सामान्य हृदय में लीन होने की दशा को 'रस-दशा' कहते हैं।


व्यक्ति-विशेष का स्वरूप: साधारणीकरण का यह अर्थ नहीं कि आलंबन आदि सामान्य रूप (जाति) में आते हैं। बल्कि, पाठक या श्रोता की कल्पना में व्यक्ति-विशेष या वस्तु-विशेष ही आती है, पर वह व्यक्ति विशेष ऐसी होती है कि वह सब सहृदय पाठकों या श्रोताओं के भाव का आलंबन हो जाती है।


तात्पर्य: साधारणीकरण आलंबनत्व धर्म का होता है, जिससे रस-मग्न पाठकों के मन में यह भेद नहीं रहता कि यह आलंबन 'मेरा है या दूसरे का'। थोड़े समय के लिए पाठक का हृदय 'लोक का सामान्य हृदय' हो जाता है।

साधारणीकरण से भिन्न रस-दशा (मध्यम कोटि की रसानुभूति):

साधारणीकरण आश्रय (पात्र) और श्रोता/पाठक के तादात्म्य (एकत्व) पर आधारित है।
लेखक रस की एक नीची अवस्था का भी उल्लेख करते हैं, जहाँ पात्र (आश्रय) श्रोता या दर्शक के लिए शील की दृष्टि से श्रद्धा, घृणा, रोष आदि किसी अन्य भाव का आलंबन बन जाता है। इस दशा में श्रोता पात्र के हृदय से अलग रहता है और तादात्म्य नहीं होता। इसे लेखक मध्यम कोटि का रसात्मक प्रभाव मानते हैं।

काव्य और तर्क/विज्ञान में अंतर:

काव्य: काव्य का विषय सदा 'विशेष' (व्यक्ति) होता है, 'सामान्य' (जाति) नहीं। यह कल्पना में 'बिम्ब' (Images) या मूर्त भावना उपस्थित करता है।

तर्क/विज्ञान: अनेक व्यक्तियों के रूप-गुण आदि के विवेचन द्वारा वर्ग या जाति ठहराना, सामान्य सिद्धांत प्रतिपादित करना, यह सब तर्क और विज्ञान (निश्चयात्मिका बुद्धि) का काम है।

व्यक्ति वैचित्र्यवाद और पाश्चात्य समीक्षा (विशेष पर बल):

आधुनिक कला-समीक्षा (विशेषकर क्रोचे के अभिव्यंजनावाद) काव्य के बोध-पक्ष पर बल देती है, जहाँ ज्ञान को केवल कल्पना में आई हुई वस्तु-व्यापार-योजना का ज्ञान-मात्र माना गया है।


व्यक्तिवाद का उदय: पुनरुत्थान-काल (Renaissance) के बाद योरप में 'व्यक्तिवाद' (Individualism) की प्रवृत्ति बढ़ी, जिससे व्यक्तिगत विशेषताओं को देखने-दिखाने की चाह बढ़ी।

परिणाम: योरप की काव्य-दृष्टि 'विरल-विशेष' (Unique-Individual) के विधान की ओर रही। उन्नीसवीं शताब्दी के बहुत से कवि ऐसे हृदयों का प्रदर्शन करने लगे जो न कहीं होते हैं और न हो सकते हैं (जैसे डंटन द्वारा शेक्सपियर के हैमलेट का चरित्र-चित्रण)। लेखक इसे कृत्रिम तमाशा मानते हैं।

निष्कर्ष:

भारतीय काव्य-दृष्टि: भिन्न-भिन्न विशेषों के भीतर से 'सामान्य' का उद्घाटन (साधारणीकरण) की ओर रही। यह मनुष्य मात्र के हृदय से होकर गए 'सच्चे तार की झंकार' सुनाने में संतुष्ट रही।

पाश्चात्य काव्य-दृष्टि: 'कल्पना' और 'व्यक्तित्व' की अधिक मुनादी के कारण बोध-पक्ष पर ही भिड़ गई, और झूठे-सच्चे विलक्षण भेद खड़े करके लोगों को चमत्कृत करने में लगी।

लेखक का मत है कि 'व्यक्तिवाद' यदि पूर्ण रूप से स्वीकार किया जाए तो कविता लिखना व्यर्थ हो जाएगा, क्योंकि यदि एक हृदय की दूसरे से कोई समानता ही नहीं, तो भावों का आदान-प्रदान कैसे होगा।

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