बौद्ध दर्शन में यथार्थ की खोज | Metaphysics and Ontology | Buddhism | Philosophy
Автор: Masterclass Of Philosophy
Загружено: 2025-12-30
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यह खंड “Metaphysics and Ontology” बौद्ध दर्शन की उस गहरी यात्रा को सामने रखता है जहाँ यथार्थ को किसी स्थायी वस्तु या अंतिम सिद्धांत के रूप में नहीं, बल्कि अनुभव, दृष्टि और बोध की प्रक्रिया के रूप में समझा जाता है। थेरवाद की कारण-आधारित दृष्टि से लेकर मध्यमक की शून्यता, योगाचार के तीन स्वभाव, तिब्बती झेनतोंग की प्रकाशमान शून्यता, हुआयान की परस्पर अंतःप्रवेशी वास्तविकता, और ज़ेन की प्रत्यक्ष अनुभूति तक—यह भाग दिखाता है कि बौद्ध Ontology कोई अमूर्त दर्शन नहीं, बल्कि मुक्ति की कार्यशील दृष्टि है।
इस खंड में नागार्जुन, वसुबन्धु, शांतरक्षित, मिपम नामग्येल, दुशुन, दोगेन और निशितानी के विचारों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि बौद्ध दर्शन “क्या है?” का उत्तर देने से ज़्यादा, “हम कैसे देखते हैं?” का रूपांतरण करता है। यहाँ शून्यता नकार नहीं, बल्कि पकड़ के ढीले पड़ने का नाम है; और वास्तविकता कोई दूर की अवधारणा नहीं, बल्कि यही क्षण—जैसा है वैसा।
यह भाग उन श्रोताओं और पाठकों के लिए है जो दर्शन को केवल समझना नहीं चाहते, बल्कि उसे जीना चाहते हैं—जहाँ विचार धीरे-धीरे मौन में बदलते हैं, और मौन स्वयं यथार्थ बन जाता है।
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