Folk Tales | बाल गीत | का ले के परदेस जाउं | Chandan Tiwari
Автор: Chandan Tiwari {Purabiyataan}
Загружено: 2019-09-06
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खूंटे में मोर दाल है
का खाउं,का पीउं
का ले के परदेस जाउं
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चंदन तिवारी के बारे में
• चंदन तिवारी मूल रूप से बिहार के भोजपुर ज़िले के बड़कागांव की रहने वाली हैं. पेशे से लोकगायिका. शिक्षा, झारखंड के बोकारो शहर में हुई. पिछले करीब डेढ़ दशक से अधिक समय से बिहार, झारखंड एवं पूर्वांचल की लोकसंगीत परंपराओं के संरक्षण, संवर्धन और प्रस्तुति में निरंतर सक्रिय हैं. चंदन तिवारी की पहचान भोजपुरी लोकगायन से है,पर साथ ही मैथिली,मगही,अवधी,नागपुरी,खोरठासमेत दर्जन भर भाषाओं में गायन करती हैं.साथ ही हिंदी कविताओं और गजल गायन में इन्होंने अपनी खास पहचान बनायी है.
• लोकसंगीत में उल्लेखनीय योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी (भारत सरकार) द्वारा प्रतिष्ठित ‘बिस्मिल्लाह ख़ान युवा पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है. बिहार सरकार ने ‘बिंध्यवासिनी देवी सम्मान (बिहार कला सम्मान)’ प्रदान किया है.
• एक ओर जहां प्रसिद्ध राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका ‘इंडिया टुडे’ ने चंदन तिवारी को देश के उभरते सितारों में शामिल करते हुए अपने कवर पेज पर स्थान दिया, वहीं दूसरी ओर 'न्यूज 24' ने श्रेष्ठ पारंपरिक लोकगायिका का खिताब दिया है. भोजपुरी की पुरानी और प्रतिष्ठित सांस्कृतिक—साहित्यिक संस्था पश्चिम बंग भोजपुरी परिषद (कोलकाता) ने चंदन तिवारी को ‘भोजपुरी कोकिला’ की उपाधि प्रदान की है. बिहार सरकार की राज्य महिला आयोग ने चंदन तिवारी को राज्य के उन पांच युवा आइकन में स्थान दिया, जिन्होंने राज्य के युवाओं को अपने काम से प्रेरित और प्रभावित किया है. बिहार,झारखंड और बंगाल के प्रमुख अखबार 'प्रभात ख़बर' ने इनके काम के प्रभाव के आधार पर ‘अपाराजिता सम्मान’ से अलंकृत किया है.
• चंदन तिवारी अब तक देश–विदेश में 800 से अधिक मंचीय प्रस्तुतियां दे चुकी हैं. इन प्रस्तुतियों में दूर-दराज़ के ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर महानगरों, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच शामिल हैं. इन्होंने नीदरलैंड और दुबई में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगीत महोत्सवों में भारतीय और पुरबिया लोक संगीत का प्रतिनिधित्व किया है. देश के प्रमुख सांस्कृतिक मंचों जैसे इंडिया हैबिटेट सेंटर (नई दिल्ली), इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (नई दिल्ली), एनसीपीए (मुंबई), भारत भवन (भोपाल), कला भवन (इंफाल), कला भवन (बेंगलुरू), जेएनयू (नई दिल्ली), दिल्ली यूनिवर्सिटी (दिल्ली), बीएचयू (बनारस), गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय (गांधीनगर) ,बिहार म्यूज़ियम, प्रेमचंद रंगशाला, बापू सभागार, बापू टावर, एसके मेमोरियल हॉल (पटना) योगी गंभीरनाथ प्रेक्षागृह (गोरखपुर), आइटीएम(ग्वालियर),समेत देश के अनेक प्रतिष्ठित मंच, महोत्सव शामिल हैं.
• चंदन तिवारी अपनी चर्चित ‘पुरबियातान’ श्रृंखला के लिए विशेष रूप से जानी जाती हैं, जिसके अंतर्गत लोक संगीत को विभिन्न विषयों पर प्रस्तुत कर चुकी हैं और कर रही हैं. इस श्रृंखला के तहत इन्होंने न सिर्फ महाकवि विद्यापति, कबीर, रसखान, सूरदास, भिखारी ठाकुर, महेंदर मिसिर जैसे लोकप्रिय कवियों की रचनाओं को संकलित किया है, बल्कि पिछले दस सालों में 50 से अधिक वैसे गुमनाम या विस्मृत कर दिये गये लोककवियों की रचनाओं को सामने लाया है, जो अब लोकप्रिय रूप में अनेक कलाकारों द्वारा गाये जा रहे हैं.
• चंदन तिवारी मैथिली–भोजपुरी अकादमी (दिल्ली सरकार) की रिसर्च फेलो रही हैं और इन्होंने अकादमी के लिए भोजपुरी लोक गीतों के संकलन तैयार किया है. इसके साथ ही दैनिक जागरण व अन्य अखबारों के लिए नियमित संगीत स्तंभ लिखती हैं. इंडियन एक्सप्रेस, अल जज़ीरा, द वायर, द क्विंट, फर्स्टपोस्ट, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, प्रभात ख़बर, हिंदुस्तान, अमर उजाला, द लल्लनटॉप, गांव कनेक्शन, राजस्थान पत्रिका सहित अनेक मीडिया मंचों पर इनके साक्षात्कार व लेख प्रकाशित हुए हैं.
• दूरदर्शन, आकाशवाणी के साथ ही ईटीवी, बीबीसी, एनडीटीवी, आज तक, न्यूज़ 24, न्यूज़18, ज़ी न्यूज़, रेडियो मिर्ची, बिग एफएम, रेडियो धूम, रेडियो धमाल, ग्रामवाणी पर विशेष प्रस्तुतिया दे चुकी हैं.
• देश के अनेक साहित्य व संस्कृति महोत्सवों में शिरकत करने के साथ ही चंदन तिवारी ने देश की प्रतिष्ठित लिटरेचर फेस्टिवल में बिहार और पूर्वांचल के लोकसंगीत की प्रस्तुतियां दी हैं, जिनमें 'कलिंगा लिट फेस्ट', ' बनारस लिट फेस्ट', 'जागरण संवादी', ' गिरमिटिया फेस्ट', 'गाजीपुर लिट फेस्ट' आदि शामिल हैं.
• चंदन तिवारी का मानना है कि लोक संगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, मानवीय मूल्यों और समानता का सशक्त माध्यम है. इनके अनुसार लोक कला जाति, धर्म, लिंग और वर्ग के भेदभाव को समाप्त कर समाज को अधिक सुंदर और मानवीय बनाती है.
• इस दिशा में स्वैच्छिक पहल करते हुए अपनी संस्था 'पुरबिया' के माध्यम से हर महत्वपूर्ण अवसर पर 'लोकराग गीतमाला' ई बुक का प्रकाशन कर नि:शुल्क युवाओं तक पहुंचाती हैं ताकि युवा पीढ़ी लोकसंगीत से जुड़े. स्कूली छात्र-छात्राओं के साथ लोकसंगीत की कार्यशाला कर उन्हें संगीत से जोड़ना इनके प्रिय कामों में शामिल हैं.
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