RSTV Special Kavita Tumhari Sur Hamarey I Chinmayi Tripathi I Joell
Автор: Kavyaraag
Загружено: 2018-12-03
Просмотров: 2331
Описание:
Song Title -
Singer - Chinmayi Tripathi and Joell
Composer- Chinmayi Tripathi and Joell
Poet(s)- Various
Music Producer - Joell
Percussionist- Omkar Salunkhe
Video shot and edited by Rajya Sabha TV
Artist Links
/ chinmayitripathi
/ chinmayi007
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Started by Chinmayi Tripathi- A poet, singer-songwriter - Kavyaraag ( earlier known as 'The Music and Poetry Project') is a project that brings together modern music and diverse kinds of Indian poetry through songs, videos and concerts.
It started in 2018 through a crowdfunding campaign, with the objective of creating a bridge between great Hindi poetry and contemporary music for young listeners.Over the last few years, Kavyaraag has produced hundreds of songs based on classical and contemporary Hindi/Urdu poetry- varying between the poetry of Mahadevi Verma, Suryakant Tripathi 'Nirala', Ramdhari Singh 'Dinkar', Harivansh Rai 'Bachchan',to 'Faiz', 'Firaq' Nida Fazli and Paveen Shakir and also the timeless classics of Bulle Shah, Meera, Kabir, Amir Khusrau along with new age poets like Anamika, Vinod Kumar Shukla, Naresh Saxena, Sarveshwar Dayal Saxena to name a few.For enquiries reach out [email protected]/+91 9971600866
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Video description:
'Kavita Tumhari Sur Hamare' is a special program of RSTV featuring the band - 'Music & Poetry Project'.
Produced by: Irfan
Lyrics:
1. जाग तुझको दूर जाना -महादेवी वर्मा
चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना !
जाग तुझको दूर जाना !
अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले !
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले ;
आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया
जाग तुझको दूर जाना !
बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले ?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले ?
तू न अपनी छाँह को अपने लिये कारा बनाना !
जाग तुझको दूर जाना !
**
2. सखि वसन्त आया -सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"
सखि वसन्त आया ।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया ।
लता-मुकुल-हार-गंध-भार भर,
बही पवन बंद मंद मंदतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया ।
आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे,
केशर के केश कली के छुटे,
स्वर्ण-शस्य-अंचल
पृथ्वी का लहराया
**
3. खुशगप्पियाँ - अनामिका
किस अंगीठी से उठा है ये धुआँ
भुन रही मीठी मकइयाँ फिर कहाँ
इस बरस मेरे शहर की खुशबुएँ
डोर बनके खींचती मुझको वहाँ
घर जहाँ मेरा घर जहाँ
धूप के झुमके धुनकते लग रहे
मायके आई हैं क्या फिर बदलियाँ
लेट कर छत पर सितारों से करूँ खुशगप्पियाँ
है चाँद की गिल्ली अटकती धुन्द में
याद बचपन कर लिया होगा मेरा
छौंक सरसों साग जब चूल्हे पे वो
आह भर काँपी तो होगी माँ वहाँ
एक मटके में जमा रखा दही
और पिढ़िया पै जमी हो बतकही
गरम सिकती रोटियों पे घी चुपड़ गुड़ की डली
आस ही तो कर गई है दर बदर
प्यास ने ही तो बसाया है नगर
यूँ तो है खारा समंदर ये जहाँ
याद मीठे पानियों का है कुआँ
**
4. क़लम, आज उनकी जय बोल -रामधारी सिंह "दिनकर"
जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
क़लम, आज उनकी जय बोल।
जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल।
**
5. ढीठ चाँदनी -धर्मवीर भारती
आज-कल तमाम रात
चांदनी जगाती है
मुँह पर दे-दे छींटे
अधखुले झरोखे से
अन्दर आ जाती है
दबे पाँव धोखे से
माथा छू
निंदिया उचटाती है
बाहर ले जाती है
घंटो बतियाती है
आजकल तमाम रात
चाँदनी जगाती है
**
6. पतवार -शिवमंगल सिंह ‘सुमन’
आज सिन्धु ने विष उगला है
लहरों का यौवन मचला है
आज हृदय में और सिन्धु में
साथ उठा है ज्वार
तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार
लहरों के स्वर में कुछ बोलो
इस अंधड़ में साहस तोलो
कभी-कभी मिलता जीवन में
तूफानों का प्यार
तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार
यह असीम, निज सीमा जाने
सागर भी तो यह पहचाने
मिट्टी के पुतले मानव ने
कभी न मानी हार
तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार
**
7. जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे -विनोद कुमार शुक्ल
जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा।
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा
पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़ खेत
कभी नहीं आयेंगे मेरे घर
खेत खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।
जो लगातार काम से लगे हैं
मैं फुरसत से नहीं
उनसे एक जरूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा।
इसे मैं अकेली आखिरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।
**
8. पगला मल्लाह -हरिवंश राय 'बच्चन'
डोंगा डोले नित गॅंग जमुन के तीर
डोंगा डोले डोंगा डोले
आया डोला उड़ान खटोला
एक परी पर्दे से निकली
पहने पचरंग चीर
कभी अचानक ही मिल जाता मन का दामनगीर
इस तट उस तट पनघट मरघट बानी अटपट
ढूंडे माझी...
हाय किसी ने कभी ना जानी माझी मन की पीड़।
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