2-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह ईश्वर उपासना में कैसे सहायक होते है?आओं जानें। भाग-2
Автор: शिक्षा-सुरक्षा संवाद SHIKSA SURKSHA SANVAD
Загружено: 2026-01-29
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महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित
॥अष्टांग योग॥
१) योग के प्रथम अंग 'यम' के पांच विभाग है-
(क )अहिंसा (ख )सत्य
(ग ) अस्तेय (घ )ब्रह्मचर्य
(ड.)अपरिग्रह
यम के पाँच विभागों की सामान्य परिभाषा:-
1.अहिंसा- मन,वाणीऔर शरीर सब समय सभी प्राणियो के साथ वैरभाव त्याग कर प्रेमपूर्वक व्यवहार करना 'अहिंसा'कहलाती है |
*2.सत्य*-जैसा देखा हुआ,सुना हुआ,पढा हुआ,अनुमान किया हुआ ज्ञान मन में है,वैसा ही वाणी से बोलना और शरीर से आचरण करना 'सत्य' कहलाता है |
*3.अस्तेय*-किसी वस्तु के स्वामी की आज्ञा के बिना उस वस्तु को न तो शरीर से लेना,न लेने के लिए किसी को वाणी से कहना और न मन में लेने की इच्छा करना 'अस्तेय'कहलाता है |
*4.ब्रह्मचर्य*-मन तथा इन्द्रियों पर संयम करके वीर्य की रक्षा करना |
*5.अपरिग्रह*-हानिकारक एवं अनावश्यक वस्तुओ तथा विचारो का संग्रह न करना 'अपरिग्रह कहलाता है |
२) योग का दूसरा अंग नियम'के भी पांच भाग है:-
(क)शौच (ख)संतोष
(ग)तप (घ)स्वाध्याय
(ड.)ईश्वर प्रणिधान
*1.शौच*-अर्थात स्वच्छता रखना यह दो प्रकार की होती है
पहली बाहरी स्वच्छता दूसरी आन्तरिक स्वच्छता |
शरीर,वस्त्र,स्थान,खानपान पवित्र रखना बाहरी स्वच्छता है तथा
विद्याभ्यास,सत्य आचरण व सत्संग से अन्त:करण को पवित्र रखना आन्तरिक स्वच्छता है |
2.संतोष पूर्ण परिश्रम करने के पश्चात् जितना भी धन-सम्पत्ति हो,उतने से ही सन्तुष्ट रहना,उससे अधिक की इच्छा न करना 'संतोष' कहलाता है |
3.तप- सत्य धर्म कि पालना करते हुए भूख,प्यास,सर्दी,गर्मी,हानि-लाभ,मान-अपमान
आदि द्वन्द्वों का प्रसन्नतापूर्वक सहन करना 'तप' कहलाता है |
*4.स्वाध्याय*-मोक्ष प्राप्ति के साधन वेद उपनिषद,आदि सदग्रन्थो का पढना, 'ओ३म्'
'गायत्री' आदि का जप करना तथा आत्मचिन्तन करना भी 'स्वाध्याय' कहलाता है |
*5.ईश्वर प्रणिधान*-शरीर,बुद्धि,बल विद्या,धनादि समस्त साधनो को ईश्वर प्रदत्त मानकर उनका प्रयोग मन, वाणी तथा शरीर से ईश्वर प्राप्ति के लिए ही करना,सांसारिक चीजें धन,मन यश आदि की प्राप्ति के लिए न करना, ईश्वर प्रणिधान कहलाता है |
(इन यम नियमो को स्मरण करे और इन्हें *जीवन मे अपनाने का ईमानदारी से प्रयास करे।*ईश्वर प्राप्ती के लिए यह अनिवार्य है।इनका बिना आपके सभी धार्मिक कर्म कांड सिर्फ दिखावा रह जाएगे।)
अब योग के शेष छ:अंगो की परिभाषा बतायी जाती है
(३)आसन (४)प्राणायाम (५)प्रत्याहार (६)धारणा (७)ध्यान (८)समाधि
*३) आसन-*ईश्वर के ध्यान के जिस स्थिति मे सुखपूर्वक,स्थिर होकर बैठा जाये उस स्थिति का नाम 'आसन' है | जैसे: पद्मासन,सिद्धासन आदि।
*आसन का फल=*आसन का अच्छा अभ्यास हो जाने पर योगाभ्यासी को उपासना काल मे तथा व्यवाहार काल में सर्दी-गर्मी,भूख-प्यास आदि द्वन्द्व कम सताते है,तथा योगाभ्यास की आगे की क्रियाओ को करने मे सरलता होती है |
१ घटिका = 24 मिनट तक निश्चल बैठने का अभ्यास सिद्ध हो जाने पर प्राणायाम का अभ्यास प्रारम्भ करना चाहिये।
४) प्राणायाम- किसी आसन पर स्थिरतापूर्वक बैठने के पश्चात मन की चञ्चलता को रोकने के लिए,श्वास-प्रश्वास की गति को रोकने के लिए जो क्रिया की जाती है ,उसे प्राणायाम कहते है | महर्षि पतञ्जलि के अनुसार, प्राणायाम 4 प्रकार के होते हैं।
1. वाह्य-वृत्ति-श्वास बहार छोड़कर, घबराहट होने तक रोकना
2. आभ्यान्तर-वृत्ति- श्वास अन्दर भरकर, घबराहट होने तक रोकना
3. स्तम्भ-वृत्ति
4. वाह्य-आभ्यान्तर
(प्रथम दो प्राणायाम का अभ्यास सरल है।शेष दोनों को प्रारंभ मे किसी प्रशिक्षक की निगरानी मे करे।)
*प्राणायाम का फल=*प्राणायाम करने वाले का अज्ञान निरन्तर नष्ट होता जाता है तथा ज्ञान की वृद्धि होती है | स्मरण शक्ति तथा मन एकाग्रता में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है | वह रोग-रहित होकर उत्तम स्वास्थ्य को प्राप्त होता है |
५) प्रत्याहार- मन के रूक जाने पर नेत्रादि इन्द्रियो का अपने विषयो के साथ सम्बन्ध नही रहता। इंद्रियों को विषयों से हटाने का नाम ही प्रत्याहार है।आहार बाहर से होता है, प्रत्याहार अन्दर से होता है। इंद्रियाँ मनुष्य को बाह्यभिमुख किया करती हैं। प्रत्याहार के इस अभ्यास से साधक योग के लिए परम आवश्यक अन्तर्मुखिता की स्थिति प्राप्त होती है।
प्रत्याहार का फल= प्रत्याहार की सिद्धी होने से योगाभ्यासी का इन्द्रियों का अच्छा नियन्त्रण हो जाता है अर्थात वह अपने मन को जहाँ और जिस विषय मे लगाना चाहता है लगा लेता है तथा जिस विषय से मन हटाना चाहता है हटा लेता है।
६) धारणा- चित्त को एक स्थान विशेष पर केंद्रित करना ही धारणा है। ईश्वर का ध्यान करने के लिए आँख बन्द करके मन को मस्तक,भ्रूमध्य,नास्तिक,कण्ठ,ह्रदय,नाभि आदि किसी एक स्थान पर स्थिर करने या रोकना होता है |
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