रुक्मिणी ने लिखा कृष्ण को प्रेम पत्र और हो गए उसका हरण !
Автор: Brajwasi Satsang Marg
Загружено: 2026-03-11
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प्रेम पत्र की इस बात को पढ़कर कृष्ण ने किया रुक्मिणी का हरण ! कृष्ण लीला कथा। #premanandjimaharaj #katha #krishna #krishnaleela
After reading this thing in the love letter, Krishna abducted Rukmini. Krishna leela story.
आनर्त देश के राजा रैवत अपनी पुत्री रेवती के लिए सुयोग्य वर खोजने ब्रह्मा जी के पास गए।
ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि पृथ्वी पर भगवान शेषावतार बलराम जी प्रकट हुए हैं, और उनकी प्रेरणा से रेवती का विवाह बलराम जी के साथ संपन्न हुआ।
विदर्भ देश की राजकुमारी रुक्मिणी जी (जो साक्षात माता लक्ष्मी का अवतार हैं) ने भगवान श्री कृष्ण के रूप और गुणों को सुनकर उन्हें मन ही मन अपना पति मान लिया था।
परंतु उनका भाई रुक्मी, जो भगवान से द्वेष करता था, उनका विवाह शिशुपाल से कराना चाहता था
विवाह पक्का होने पर रुक्मिणी जी ने एक महाभागवत ब्राह्मण के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण को एक अत्यंत गोपनीय और प्रेमभरा पत्र भेजा
इस पत्र में उन्होंने भगवान से अपने हरण की प्रार्थना की और कुलदेवी के दर्शन के समय का पूरा मार्ग बताया
ब्राह्मण देवता द्वारा पत्र सुनकर भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि वे भी रुक्मिणी जी से उतना ही प्रेम करते हैं और उन्हें शिशुपाल आदि क्षत्रियों से छुड़ाकर अवश्य लाएंगे। इसके तुरंत बाद भगवान ने अपना रथ तैयार करवाया और रातों-रात विदर्भ नगर की ओर प्रस्थान किया।
रुक्मिणी जी का बड़ा भाई रुक्मी भगवान से द्वेष करता था और उनका विवाह शिशुपाल से कराना चाहता था। कुंडलपुर में विवाह की भव्य तैयारी चल रही थी और जरासंध व शाल्व जैसे विरोधी राजा अपनी सेना लेकर आ गए थे।
रुक्मिणी जी ने एक ब्राह्मण के माध्यम से श्रीकृष्ण को एक प्रेमभरा गुप्त पत्र भेजा। प्रभु के न आने पर रुक्मिणी जी व्याकुल थीं, लेकिन तभी उन्हें शुभ शकुन दिखने लगे और ब्राह्मण देवता ने मुस्कुराते हुए उनके आने की सूचना दी।
विवाह से पूर्व रुक्मिणी जी कुलदेवी माता अंबिका (पार्वती जी) के मंदिर में दर्शन और प्रार्थना करने गईं।
जब वे मंदिर से लौट रही थीं, तभी भगवान श्रीकृष्ण अपना रथ लेकर आए और सभी बड़े-बड़े विरोधी राजाओं व उनके सैनिकों के सामने से रुक्मिणी जी का हरण करके उन्हें अपने साथ ले गए।
रुक्मी की पराजय और दिव्य विवाह
हरण के बाद, बलराम जी के नेतृत्व में यदुवंशी सेना ने जरासंध और शिशुपाल की सेनाओं को बुरी तरह खदेड़ दिया।
क्रोधित रुक्मी ने श्रीकृष्ण का पीछा किया और कसम खाई कि श्रीकृष्ण को मारे बिना वह अपनी राजधानी कुंडलपुर नहीं लौटेगा।
भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मी को युद्ध में आसानी से हरा दिया। रुक्मिणी जी की प्रार्थना पर भगवान ने उसके प्राण तो बख्श दिए, लेकिन उसे अपमानित करने के लिए उसकी आधी मूंछ और बाल मुंडवा दिए।
बलराम जी ने आकर रुक्मी की दुर्दशा देखी तो उन्होंने स्थिति
को संभाला, रुक्मिणी जी को सांत्वना दी और क्षत्रिय धर्म के घोर नियमों के बारे में समझाया।
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