अपने समस्त कर्म मुझे अर्पित करते हुए तू मुझको ही प्राप्त होगा अर्जुन | Ch 12 Shlok 10
Автор: Gita Online
Загружено: 2026-02-23
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अभ्यासे, अपि, असमर्थः, असि, मत्कर्मपरमः, भव,
मदर्थम्, अपि, कर्माणि, कुर्वन्, सिद्धिम्, अवाप्स्यसि (10)
अभ्यासे = अभ्यास में, अपि = भी, असमर्थः = असमर्थ, असि = है तो (केवल), मत्कर्मपरमः = मेरे लिए कर्म करने के ही परायण, भव = हो जा, मदर्थम् = मेरे निमित्त, कर्माणि = कर्मों को, कुर्वन = करता हुआ, अपि = भी, सिद्धिम = मेरी प्रतिरूप सिद्धि को, अवाप्स्यसि = प्राप्त होगा।
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ईश्वर का प्रतिपल स्मरण-सगुण ब्रह्म-अगर कठिन है तो अभ्यास द्वारा योग को साधो।
यह दोनों भी कठिन हों तो अपने समस्त कर्म मुझे अर्पित करना आरम्भ करो - कर्म योग।
जो सभी कार्य केवल खुली आँखों करने के अत्यधिक अभ्यस्त हैं और उनके लिए स्थिर हो पाना कठिन है उन्हें फिर अपने समस्त कर्म ईश्वर आराधना स्वरूप ही करने चाहिए। कर्त्तव्यपरायणता - कर्तव्य निष्ठा के द्वारा ऐसा जीव भले ही ईश्वर की उपासना स्थापित प्रतीकों अथवा धारणाओं के रूप में नहीं करता हो तब भी वह बड़ी सहजता से अपने उत्कर्ष को सुनिश्चित कर सकता है।
जीवन का उद्देश्य अर्थात आत्मनो मोक्षार्थ ऐसे भाव द्वारा सिद्ध हो सकता है।
ज्ञानी यह भी कहते हैं की योग में अनेक प्रकार की साधनाओं से प्राप्त अवस्थाएं इस कर्तव्यपरायणता के द्वारा अर्जित हो जाती हैं। devotion - dedication #bhaktiyoga
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