मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान || Cognizance By Magistrate || धारा 190 || दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973
Автор: The Legal
Загружено: 2024-03-06
Просмотров: 917
Описание:
मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान || Cognizance By Magistrate || धारा 190 || दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973
#संज्ञान
#Cognizance
#धारा190
#दंडप्रक्रियासंहिता
#legal
#thelegal
00:20 संज्ञान
01:54 संज्ञान लेने के लिए सक्षम प्राधिकारी
02:35 संज्ञान किन परिस्थितियों में किया जा सकता है
The Pdf File of This Video is in The Description 👇👇
इस वीडियो की पीडीएफ फ़ाइल डिस्क्रिप्शन में है 👇👇
https://drive.google.com/file/d/1-L2J...
प्रश्न- संज्ञान से आप क्या समझते है? संज्ञान लेने के लिए सक्षम प्राधिकारी कौन है? किन आधार पर मजिस्ट्रेट संज्ञान (Cognizance) ले सकता है।
उत्तर- किसी मामले में जांच या विचारण तभी हो सकता है जब पहले मजिस्ट्रेट उस अपराध का संज्ञान करे। संज्ञान शब्द दण्ड प्रक्रिया संहिता में परिभाषित नहीं है इस शब्द का प्रयोग धारा- 190 में किया गया है संज्ञान का शाब्दिक अर्थ - ध्यान देना है (To Take Notice)
अचित कुमार पालित बनाम प० बंगाल राज्य 1963 S.C
इस मामले में संज्ञान' शब्द को परिभाषित करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि, जब मजिस्ट्रेट किसी अपराध की ओर इस उद्देश्य से ध्यान देता है कि, अभियुक्त के विरूद्ध दण्ड प्रक्रिया संहिता में बताई गई न्यायिक कार्यवाही की जानी चाहिए तब उसके द्वारा उस अपराध का संज्ञान लेना कहा जाता है।
यदि कोई न्यायिक कार्यवाही नहीं की जाती है और अन्य प्रकार के आदेश दिए जाते है तो संज्ञान करना नहीं कहा जाता है यदि मजिस्ट्रेट ने संहिता की धारा- 156(3) के अनुसार पुलिस को अन्वेषण का आदेश दिया है या अन्वेषण में सहायता के लिए तलाशी, कुर्की या गिरफ्तारी के वारण्ट जारी किए है तो इन आदेशों को संज्ञान करना नहीं कहा जा सकता।
• संज्ञान लेने के लिए सक्षम प्राधिकारी:-
1. दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 190(1) के अनुसार "कोई प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट किसी भी अपराध का संज्ञान कर सकता है।
2. मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट किसी द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट को ऐसे अपराधों का जिनका जांच या विचारण करना उसकी छमता के अन्दर है संज्ञान करने के लिए सशक्त (Empower) कर सकता है।
3. सत्र न्यायालय (Court of Session ) भी एक परिस्थिति में संज्ञान ले सकता है यदि मामला धारा-199(2) के अन्तर्गत आता है।
प्रश्न- संज्ञान किन परिस्थितियों में किया जा सकता है।
उत्तर- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा- 190 के अन्तर्गत संज्ञान निम्नलिखित तीन परिस्थितियों में किया जा सकता है:-
1. किसी व्यक्ति द्वारा परिवाद पेश किए जाने पर
2. किसी पुलिस अधिकारी द्वारा रिपोर्ट किए जाने पर
3. पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी अन्य व्यक्ति से अपराध की सूचना मिलने पर या मजिस्ट्रेट की अपनी जानकारी के आधार पर
कुछ परिस्थितियां ऐसी भी है जब कि, उपरोक्त प्रकार की कार्यवाही होने पर भी मजिस्ट्रेट संज्ञान नहीं ले सकता जब तक कि, कुछ अन्य शर्तें पूरी न हो जाए इन परिस्तथियों का वर्णन संहिता की धारा- 195 से धारा- 199 में किया गया है।
1. किसी व्यक्ति द्वारा परिवाद पेश किए जाने पर-
किसी व्यक्ति द्वारा परिवाद पेश किए जाने पर मजिस्ट्रेट उस परिवाद में वर्णित अपराध का संज्ञान कर सकता है। परिवाद पेश किए जाने पर यह आवश्यक नहीं है कि, मजिस्ट्रेट उसमें बताए गए अपराध का संज्ञान अवश्य करें यदि मजिस्ट्रेट उचित समझे तो संज्ञान करने से पहले पुलिस को धारा 156(3) के अनुसार अन्वेषण करने का आदेश दे सकता है यदि अन्वेषण के बाद भी पुलिस अधिकारी अभियुक्त का चालान करती है तो पुलिस रिपोर्ट के आधार पर ही मजिस्ट्रेट अपराध का संज्ञान करेगा। यदि पुलिस अन्वेषण करने के बाद अभियुक्त का चालान करना ठीक नहीं समझती है तो भी मजिस्ट्रेट यदि चाहे तो परिवाद पर जो उसके समक्ष पेश किया गया है संज्ञान कर सकता है जिस मामले में पुलिस ने अन्वेषण करने के बाद अन्तिम रिपोर्ट दी है अर्थात उस मामले को चालान करने के योग्य नहीं समझा है, उसमें भी यदि कोई पक्षकार परिवाद करता है तो मजिस्ट्रेट अपराध का संज्ञान कर सकता है।
2. किसी पुलिस अधिकारी द्वारा रिपोर्ट किए जाने पर-
इससे तात्पर्य उस रिपोर्ट से है जो पुलिस अधिकारी अन्वेषण की समाप्ति पर किसी अभियुक्त के विरूद्ध जांच या विचारण के लिए मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करता है साधारण भाषा में इसको चालान पेश करना कहा जाता है।
साधारणतः पुलिस उन्हीं मामलों में चालानी रिपोर्ट (आरोप पत्र ) पेश करती है जहां उसे अन्वेषण करने की शक्ति है। संज्ञेय मामलों में पुलिस मजिस्ट्रेट से अनुमति लिए बिना अन्वेषण कर सकती है और यदि उचित साक्ष्य मिले तो चालानी रिपोर्ट भी दे सकती है।
असंज्ञेय मामलों में पुलिस को मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना अन्वेषण करने की शक्ति नहीं है यदि मजिस्ट्रेट से अनुमति मिलने पर अन्वेषण करके चालानी रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है तो वह भी पुलिस रिपोर्ट के अन्तर्गत माना जायेगा।
उपखण्ड मजिस्ट्रेट दिल्ली बनाम रामकली 1968 S.C
इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारण किया कि, पुलिस अधिकारी द्वारा चालानी रिपोर्ट पेश करने पर मजिस्ट्रेट के लिए उसमे लिखे अपराध का संज्ञान करना आवश्यक है यह मजिस्ट्रेट के विवेक पर निर्भर नहीं करता है। परन्तु
अभिन्नद झा बनाम दिनेश मिश्र- 1968 S.C
इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि, यह आवश्यक नहीं है कि पुलिस की चालानी रिपोर्ट पर मजिस्ट्रेट संज्ञान अवश्य करे।
Повторяем попытку...
Доступные форматы для скачивания:
Скачать видео
-
Информация по загрузке: