श्रीमद् भागवत गीता II द्वादश अध्याय II भक्ति योग II श्लोक 12 II Madbhagvat Geeta II Chapter 12
Автор: Mahakal_
Загружено: 2026-03-17
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श्रीमद भगवद गीता का 12वां अध्याय 'भक्तियोग' के नाम से जाना जाता है। इसमें केवल 20 श्लोक हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए भक्ति के मार्ग, निराकार बनाम साकार उपासना, और एक सच्चे भक्त के गुणों पर केंद्रित हैं। यह अध्याय स्पष्ट करता है कि ईश्वर में मन स्थिर करना ही सर्वोच्च भक्ति है।
भक्तियोग के मुख्य बिंदु:
भक्ति की श्रेष्ठता: अर्जुन के पूछने पर, कृष्ण ने बताया कि जो भक्त निराकार (अक्षर) के बजाय साकार (सगुण) रूप में मन लगाकर, श्रद्धा के साथ मेरी उपासना करते हैं, वे योगियों में मुझे श्रेष्ठ लगते हैं।
सच्चे भक्त के लक्षण (श्लोक 13-19): कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त:
किसी भी जीव से द्वेष नहीं करता और करुणावान है।
अहंकार और 'ममता' (मेरा-तेरा) की भावना से मुक्त है।
दुःख-सुख में समभाव (समान) रहता है और क्षमाशील है।
प्रशंसा और निंदा को समान मानता है, जो मौन और संतुष्ट रहता है।
शत्रु-मित्र, मान-अपमान, और सर्दी-गर्मी में एकसमान है।
वही भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है।
भक्ति के स्तर: कृष्ण कहते हैं कि यदि आप मन को मुझमें स्थिर नहीं कर सकते, तो अभ्यास योग (अध्यात्म ज्ञान) का सहारा लें, यदि वह भी कठिन हो, तो मेरे लिए कर्म करें, और यदि वह भी न हो, तो अपने कर्मों के फलों का त्याग करें।
यह अध्याय भक्ति को ज्ञान और कर्म से सरल और सीधा मार्ग बताता है।
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