बिलासपुर में गोविंद सागर में समाए मंदिर
Автор: Ramankasafar
Загружено: 2025-01-15
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गोविंदसागर मैं कुछ ही महीने सांस ले पाते हैं मंदिर फिर पानी में डूब जाते हैं
बसाया गया शहर, भुलाए गए भगवान
कुछ ही महीने सांस ले पाते हैं मंदिर के पत्थर
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मंदिरों की स्थापत्य कला बेजोड़ है. देश के दूसरे कोनों में ऐसी स्थापत्य कला के मंदिर सहेजे जा रहे हैं. मगर यहां हाल दूसरा है. यह मंदिर साल के ज्यादातर समय पानी में डूबे रहते हैं. कुछ ही महीने ऐसे होते हैं जब पानी घटता है तो मंदिर का कुछ हिस्सा बाहर आता है और यह पत्थर सांस ले पाते हैं. जाहिर है, क्षरण से इन पत्थरों को नुकसान पहुंच रहा है मगर अब भी इनकी सुंदरता शेष है और इसे सहेजने की जरूरत है.
बिलासपुर. गज-ग्राह की कथा सुनी है? वही जिसमें गज (हाथी) को ग्राह (मगरमच्छ) पानी में खींच रहा था. गज की प्रार्थना पर स्वयं नारायण आए और ग्राह को मारकर उसका उद्धार किया. भाखड़ा नांगल बांध की झील गोविंद सागर में डूबे पुराने शहर के मंदिरों का भी कुछ ऐसा ही हाल है. महीनों तक पानी में गुम रहने वाले इन मंदिरों को उद्धार करने वालों का इंतजार है तो शहर के आस्थावान भी किसी भी तरह इन मंदिरों को बचाने की आस लगाए हैं.
बसाया गया शहर, भुलाए गए भगवान
भाखड़ा नांगल बांध बनने के बाद जब गोविंद सागर का विस्तार हुआ तो बिलासपुर नगर के लोगों का विस्थापन शुरू हुआ. प्रशासन ने लोगों को दूसरी ऊंची जगह पर बसा दिया. मगर इस सब के बीच भगवान भुला दिए गए. पुराने सांडू के मैदान में कई पौराणिक और नक्काशीदार मंदिर बने हुए थे जो झील के पानी में समा गए.
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