ताते पकरि पकरि यमलूटै I Sant Kabir I Nirgun Bhajan I Kabir Ke Dohe I
Автор: Omniversal
Загружено: 2025-10-27
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Tate Pakri Pakri Yamlute I Kabir Bhajan I Sadguru Kabirdas Ji I
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भावार्थ:
मन में राम (परमात्मा) के विषय में जो संशय (संदेह) की गाँठ बंधी है, वह नहीं खुलती — यही कारण है कि मृत्यु के समय यम (मृत्यु) उसे बार-बार पकड़कर कष्ट देते हैं।
तुम अपने को कभी गरीब (मसकीन), कभी कुलीन (श्रेष्ठ कुल में जन्मा), कभी योगी, कभी संन्यासी, ज्ञानी, वीर, कवि, या दाता कह लेते हो — परंतु तुम्हारी बुद्धि (मति) का अंधकार किसी ने दूर नहीं किया।
तुम स्मृतियाँ, वेद और पुराण सब पढ़ते हो, पर अनुभव (अंतःकरण की अनुभूति) नहीं प्राप्त करते।
जैसे लोहा तब तक सोना नहीं बन सकता जब तक पारस (स्पर्शमणि) उसे न छू ले — वैसे ही शास्त्र पढ़ने से आत्मज्ञान नहीं होता जब तक अनुभव का स्पर्श न हो।
जो जीवित रहते हुए ही आत्मज्ञान में नहीं तर पाया, वह मरने के बाद कैसे तर पाएगा?
जिसने जीवन में ही श्रद्धा (परतीति) को पकड़ा और अनुभव किया — वही मेरे (कबीर के) समान पार हो गया।
जो भी कर्म ज्ञान या अज्ञान में किए गए हैं, उसे जो सच्चा ज्ञानी है, वही ठीक से समझ सकता है।
कबीर कहते हैं — ऐसे भ्रमित दृष्टि वाले व्यक्ति से क्या कहा जाए जो देखता हुआ भी सच्चाई को नहीं देख पाता।
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