सुनैत्रा पवार : राजनैतिक अनुकंपा नियुक्ति, संवैधानिक उत्तराधिकार अथवा राजनैतिक असंवेदनशीलता!
Автор: SAI NEWS
Загружено: 2026-01-31
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लिमटी की लालटेन 749
हड़बड़ी में सुनेत्रा पवार की ताजपोशी से कहीं संदेश गलत न चला जाए सियासी हलकों में . . .
(लिमटी खरे)
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महाराष्ट्र की राजनीति में जब भी कोई बड़ा घटनाक्रम घटित होता है, उसका प्रभाव केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसकी गूंज समाज, संवेदना और लोकतांत्रिक मर्यादाओं तक रहती है। वैसे भी महाराष्ट्र की सियासत नाटकीय घटनाक्रमों और अप्रत्याशित कदमों के लिए पहचानी जाने लगी है। महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री रहे अजीत पवार के निधन के मात्र चार दिन बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार द्वारा महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना ऐसा ही एक घटनाक्रम है, जिसने पूरे देश में तीखी बहस को जन्म दिया है।
यह निर्णय जहां एक ओर राजनीतिक स्थिरता, संवैधानिक प्रक्रिया और नेतृत्व की निरंतरता का प्रतीक बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे संवेदनहीनता, राजनीतिक अवसरवाद और वंशवादी राजनीति का चरम उदाहरण भी कहा जा रहा है। प्रश्न केवल यह नहीं है कि शपथ लेना सही था या गलत, बल्कि यह है कि क्या राजनीति को मानवीय शोक, नैतिकता और समयबोध से पूरी तरह विलग किया जा सकता है?
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के जमीन से जुड़े जनाधार वाले नेता और सूबे के उप मुख्यमंत्री अजीत पवार का 28 जनवरी को बारामती में विमान दुर्घटना में देवलोकगमन से समूचा सूबा न केवल स्तब्ध था वरन शोक र्में डूबा हुआ था। इससे सत्ता के गलियारों में एक रिक्तता महसूस की जाने लगी थी। शोक की लहर अभी जारी ही थी कि इसी शून्य की भरपाई के लिए उनके निधन से महज 04 दिन बाद ही उनकी अर्धांग्नि एवं राज्य सभा सांसद सुनेत्रा पवार के द्वारा उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली गई। क्या राज्य सभा सांसद रहते हुए सुनेत्रा पवार पार्टी के दायित्वों का निर्वहन नहीं कर सकतीं थीं। अब उन्होंने राज्य के उप मुख्यमंत्री की शपथ ले ली है तो जाहिर है वे राज्य सभा से त्यागपत्र देंगी ही, और उनके स्थान पर उनके पुत्र पार्थ पवार को राज्यसभा भेज दिया जाएगा।
राजनीति की खासियत है कि परिवारवाद का विरोध हर किसी दल के द्वारा किया जाता है, पर परिवारवाद को उपजाऊ माहौल, खाद बीज भी सियासी दल के द्वारा ही दिए जाते हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी वरिष्ठ नेता का निधन हुआ है तब तब उनके वारिसान को ही उनकी कुर्सी थमाई जाती है। जिस तरह सरकारी नौकरी में अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान है उससे एक कदम आगे सियासत में राजनैतिक अनुकंपा नियुक्ति दिखाई देती है। यक्ष प्रश्न तो यही खड़ा हुआ है कि देश की सियासी व्यवस्था में क्या कोई पद अनुकंपा नियुक्ति या उत्तराधिकारी के लिए निर्मित किया गया है! राजनैतिक दल क्या किसी तरह का प्रतिष्ठान या पीठ है जो कुछ दिनों के लिए रिक्त नहीं रह सकती!
कहा जा रहा है कि अजीत पवार के निधन के उपरांत राज्य सरकार और गठबंधन में नेतृत्व को लेकर मंथन आरंभ हुआ, सत्ता में संतुलन बनाए रखने के लिए तत्काल ही उपमुख्यमंत्री के लिए नाम पर चर्चा आरंभ हो गई। गठबंधन के सहयोगियों के दबाव के चलते राजनैतिक गणनाएं आरंभ हुईं। सुनेत्रा पवार को आगे इसलिए किया गया ताकि सहानुभूति के चलते सियासी मारकाट पर लगाम लगाई जा सके। इस पूरे घटनाक्रम के पक्ष और विपक्ष दोनों में ही तर्क दिए जा रहे हैं। आईए हम सबसे पहले पक्ष में दिए जा रहे तर्कों को समझते हैं।
एनसीपी समर्थकों का कहना है कि सरकार के कामकाज को भावनाओं के आधार पर नहीं रोका जा सकता है। उप मुख्यमंत्री का पद रिक्त रहना प्रशासनिक अस्थिरता पैदा कर सकता था, ऐसे समय में त्वरित निर्णय आवश्यक था एवं राज्य जैसे बड़े प्रशासनिक ढांचे में नेतृत्व शून्यता को लंबे समय तक स्वीकार नहीं किया जा सकता। वहीं सुनेत्रा पवार के बारे में कहा जा रहा है कि वे सिर्फ अजीत पवार की अर्धांग्नि ही नहीं थीं, वे वर्षों से सामाजिक, सहकारी और संगठनात्मक कार्यों से जुड़ी रही हैं। राजनीति को नज़दीक से समझने का अनुभव उनके पास है। वे सत्ता संचालन की बारीकियों से परिचित हैं।
वहीं जानकार यह भी कहा रहे हैं कि राजनीतिक स्थिरता और गठबंधन की मजबूरी के चलते ऐसा कदम उठाया गया है, क्योंकि महाराष्ट्र की राजनीति गठबंधनों पर आधारित है। ऐसे में नेतृत्व परिवर्तन में देरी से सरकार गिरने का खतरा था। सहयोगी दलों का विश्वास बनाए रखना जरूरी था। विपक्ष को अवसर न मिले, यह भी एक रणनीतिक आवश्यकता थी। यह निर्णय समर्थकों के अनुसार भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक था।
वहीं, पार्टी को को बिखरने से बचाने की रणनीति के चलते यह किया गया है, क्योंकि अजीत पवार एनसीपी (अजीत गुट) के केवल नेता नहीं थे, बल्कि वे पार्टी की धुरी थे . . .
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