मैहर देवी का संपूर्ण दर्शन , कोई खास ही पहले पूजा करता है,Maihar devi Mp full view
Автор: Dear Av vlogs
Загружено: 2023-08-22
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मैहर में शारदा माँ का प्रसिद्ध मन्दिर है जो नैसर्गिक रूप से समृद्ध कैमूर तथा विंध्य की पर्वत श्रेणियों की गोद में अठखेलियां करती तमसा के तट पर त्रिकूट पर्वत की पर्वत मालाओं के मध्य 600 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यह ऐतिहासिक मंदिर 108 शक्ति पीठों में से एक है। यह पीठ सतयुग के प्रमुख अवतार नृसिंह भगवान के नाम पर 'नरसिंह पीठ' के नाम से भी विख्यात है। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर आल्हखण्ड के नायक आल्हा व ऊदल दोनों भाई मां शारदा के अनन्य उपासक थे। पर्वत की तलहटी में आल्हा का तालाब व अखाड़ा आज भी विद्यमान है। यहाँ प्रतिदिन हजारों दर्शनार्थी आते हैं किंतु वर्ष में दोनों नवरात्रों में यहां मेला लगता है जिसमें लाखों यात्री मैहर आते हैं। मां शारदा के बगल में प्रतिष्ठापित नरसिंहदेव जी की पाषाण मूर्ति आज से लगभग 1500 वर्ष पूर्व की है। देवी शारदा का यह प्रसिद्ध शक्तिपीठ स्थल देश के लाखों भक्तों के आस्था का केंद्र है माता का यह मंदिर धार्मिक तथा ऐतिहासिक है।
के जे एस के पास इच्छापूर्ति मंदिर पर्यटकों का दर्शनीय स्थल है ।
उत्पत्ति
ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष प्रजापति का विवाह स्वायम्भुव मनु की पुत्री प्रसूति से हुआ था। प्रसूति ने सोलह कन्याओं को जन्म दिया जिनमें से स्वाहा नामक एक कन्या का अग्नि देव के साथ, स्वधा नामक एक कन्या का पितृगण के साथ, सती नामक एक कन्या का भगवान शंकर के साथ और शेष तेरह कन्याओं का धर्म के साथ विवाह हुआ। धर्म की पत्नियों के नाम थे- श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री और मूर्ति।
इतिहास
मैहर इतिहास Paleolithic आयु के बाद से पता लगाया जा सकता है। मैहर शक्तिपीठ श्री श्री माता सतीजी के हार का त्रिकुट पर्वत पर गिर जाने से मैहर (माई का हार) इस जगह का नाम पड़ा जो कालांतर में वह जगह मां शारदा के मन्दिर के रूप में प्रतिष्ठापित हुआ, और त्रिकुट पर्वत का पूरा क्षेत्र मैहर के नाम से प्रसिद्ध हुआ जहां धीरे धीरे मैहर शहर विस्तार किया वह कभी महिष्मति साम्राज्य के अंदर आता था बादमें प्रतिहार, पाल, गोंड, चंदेल, बघेल आदि राजाओं ने भी यहां माता के आशीर्वाद से राज्य किया, गौरतलब है की चंदेल राजाओं के महान सेनानायक आल्हा ऊदल माताजी के परम् भक्त थे कहते हैं माताजी आल्हा से साक्षात बात करती थी और आल्हा आज भी माताजी की पूजा करने आते हैं जिसके प्रमाण कोविड 19 के दौरान जब लॉकडाउन में मंदिर बंद कर दिया और पुलिस की पहरेदारी थी पर सुबह जब पुजारी जी ने मन्दिर खोला तो आश्चर्य चकित रह गया वहां फल फूल नारियल चुनरी अगरबत्ती प्रसाद सब चढ़ा हुआ था, ऐसी महिमा है माई शारदा जी की वो भक्तों को हमेशा अभय और अमर करती है जैसे आल्हा भगत आज भी मौजूद हैं आदि शहर के पूर्व में मैहर रियासत की राजधानी थी।
[3]परिवहन
मैहर अच्छी तरह से आवागमन के माध्यमों से जुड़ा हुआ है। यह दोनों प्रमुख माध्यम रेल मार्ग और सड़क मार्ग 7 एन एच (राष्ट्रीय राजमार्ग) से जुड़ा हुआ है। शारदा माता मंदिर मैहर रेलवे स्टेशन से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मंदिर तक आप जाने के लिए रोपवे का भी इस्तेमाल कर सकते हैं जबलपुर स्टेशन 162 किलोमीटर मैहर से दूर स्थित है। मैहर रेलवे स्टेशन पश्चिम मध्य रेलवे के कटनी और सतना स्टेशनों के बीच में स्थित है। नवरात्रि त्योहार के दौरान वहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है। इसलिए इन दिनों के दौरान अप और डाउन के सभी ट्रेने यात्रियों की सुविधा के लिए मैहर में रूकती है । निकटतम हवाई अड्डा जबलपुर हैं। मैहर,कटनी जंक्शन और सतना जंक्शन के बीच स्थित है। रेलवे स्टेशन कोड MYR है। दोनों जंक्शनों के मध्य कई ट्रेनों का आवागमन दिन भर रहता है। यहां दो बस स्टैंड है जिसमें से एक देवी मंदिर से करीब 1-1.5 किलोमीटर दूर स्थित है जहां से सतना जैसे बड़े शहरों के लिए बसों का आवागमन होता रहता है। दूसरा बस स्टैंड रेलवे स्टैंड के दूसरी ओर ( प्लेटफ्राम 2 के ओवर ब्रिज)से निकलने के बाद शहर की ओर से जाने वाले रास्ते में मुख्य सड़क के दायीं ओर (करीब 1 किलोमीटर दूर) स्थित है। सबसे सरल मार्ग के तौर पर मैहर रेलवे स्टेशन से ऑटो के माध्यम से मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।
शारदा देवी मंदिर परंपरा का पता चलता है कि योद्धाओं आल्हा और उदल, जो पृथ्वी राज चौहान के साथ युद्ध किया था इस जगह के साथ जुड़े रहे हैं। दोनों भाई शारदा देवी के बहुत मजबूत अनुयायी थे। कहा जाता है कि आल्हा 12 साल के लिए penanced और शारदा देवी के आशीर्वाद स अर्मत्व है। आल्हा और उदल करने के लिए इस दूरदराज के जंगल में देवी की यात्रा पहले कहा जाता है। आल्हा को नाम 'शारदा माई' द्वारा देवी माँ कह कर बुलाते थे और अब वह 'के रूप में माता शारदा माई' लोकप्रिय हो गया। एक नीचे मंदिर, के रूप में 'आल्हा तालाब' ज्ञात तालाब के पीछे पहाड़ी देख सकते हैं। हाल ही में इस तालाब और आसपास के क्षेत्रों में साफ किया गया है / तीर्थयात्रियों के हित के लिए rennovated. इस तालाब से 2 किलोमीटर की दूरी पर आल्हा औरउदल जहां वे कुश्ती का अभ्यास किया था के अखाड़े स्थित है। [5]
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