गोपाचल गुफाएं - मध्ययुगीन स्थापत्य कला का अजूबा | Gopachal Parvat Caves | Gwalior
Автор: Peepul Tree World
Загружено: 2021-08-19
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मध्य प्रदेश में ग्वालियर का ये विशाल क़िला सबसे लोकप्रिय पर्यटक स्थलों में से एक है जिसे देखने के लिये बड़ी संख्या में सैलानी आते हैं….. लेकिन इसी क़िले के परिसर में वास्तुकला का एक अजूबा भी है जिसके बारे में लोग कम ही जानते हैं। ये दरअसल चट्टानों को तराश कर बनाईं गईं जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां हैं जिन्हें गोपाचल पर्वत जैन स्मारक कहा जाता है।
लेकिन यह कोई मामूली मूर्तियां नहीं हैं। इनका शुमार चट्टानों को तराशकर बनाईं गईं अनोखी मूर्तियों में किया जाता है।
प्राचीन काल से ही ग्वालियर और इसके आसपास के इलाक़े जैन धर्म के महत्वपूर्ण केंद्र और तीर्थ-स्थल रहे हैं.... विदिशा, सोनागिरी और चंदेरी में कुछ सबसे पवित्र जैन मंदिर भी हैं। चूंकि इनमें से ज़्यादातर शहर व्यापारिक मार्ग दक्षिणपथ पर या फिर इसके आसपास स्थित थे इसलिये यहां जैन व्यापारियों और सौदागरों का अक्सर आना जाना लगा रहता था.....
इन मंदिरों के निर्माण के लिये इन व्यापारियों और सौदागरों ने दान किया था। ग्वालियर क़िले की दीवारों के ठीक नीचे क़रीब डेढ़ हज़ार जैन मूर्तियां हैं जो पांच समूहों में बंटी हुई हैं। इस क्षेत्र में मिले अभिलेखों के अनुसार इनमें से ज़्यादातर मंदिर 15वीं शताब्दी में बनवाए गये थे लेकिन माना जाता है कि कुछ मंदिर 7वीं शताब्दी के भी हैं।
इन मंदिरों को सबसे पहले फ़ादर मोंसेरेट ने देखा था। वह पहले यूरोपीय थे जो अकबर के शासनकाल में सूरत से दिल्ली आते समय ग्वालियर से भी गुज़रे थे.....लेकिन वह इन मंदिरों की शिनाख़्त नहीं कर पाए थे।
सन 1862 और 1865 के बीच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक एलेक्जेंडर कनिंघम ने जैन मूर्तियों सहित पूरे ग्वालियर पर एक रिपोर्ट तैयार की थी। उन्होंने इस रिपोर्ट में कहा था कि ग्वालियर में जैन मूर्तियों के पांच प्रमुख समूहों में, मूर्तियों का सबसे महत्वपूर्ण समूह गोपाचल पर्वत है।
स्थानीय लोग गोपाचल पर्वत मूर्तियों को एक पत्थर की बावड़ी कहते हैं....सन 1468 और 1473 के बीच यहां खुदाई करवाई गई थी जिसमें ये मूर्तियो मिली थीं। उस समय ग्वालियर का क़िला तोमर राजाओं के अधीन था। राजपूत राजवंश के तोमर राजाओं ने 14वीं सदी से लेकर 16वीं सदी तक ग्वालियर पर राज किया था और वे सांस्कृतिक गतिविधियों के सरपरस्त के रुप में जाने जाते थे। गोपाचल पर्वत समूह क़िले की दक्षिण-पूर्व दीवार के नीचे क़रीब आधा मील की ढ़लान पर मौजूद है। मूर्तियों के पांच समूहों में गोपाचल पर्वत समूह सबसे बड़ा है... इसमें 26 गुफाएं हैं जिनमें तीर्थंकरों की विशाल मूर्तियां हैं। 18 मूर्तियां क़रीब 20-30 फुट ऊंची हैं जबकि बाक़ी मूर्तियों की ऊंचाई क़रीब 8 से 15 फ़ुट है।
इनके निर्माण के क़रीब साठ साल बाद यानी सन 1527 में ही मुग़ल बादशाह बाबर के शासनकाल के दौरान बाबर के आदेश पर इन्हें तोड़ा गया था जिसका उल्लेख ख़ुद बाबर ने अपने संस्मरण में किया है। मूर्तियों को तोड़े जाने के सदियों बाद जैन समुदाय ने इनकी मरम्मत करवाई थी....मरम्मत के दौरान खंडित मूर्तियों के ऊपर संग मरमर के पलस्तर से सिर बना दिये गये थे।
गोपाचल स्मारकों में तीर्थंकरो को पद्मासन में बैठे हुए और कायोत्सर्ग आसन में खड़े हुए दर्शाया गया है। यहां प्रथम तीर्थंकर रिषभनाथ, 22वें तीर्थंकर नेमीनाथ और 24वें तीर्थंकर महावीर की मूर्तियां हैं....जैन परंपराओं के अनुसार माना जाता है कि 23वें तीर्थंकर पार्शवनाथ ने इस पहाड़ी पर उपदेश दिया था। इस पर्वत पर भगवान पार्शवनाथ की बैठी हुई मुद्रा में 42 फ़ुट ऊंची मूर्ति है जो इन स्मारकों का सबसे प्रमुख आकर्षण है..... इसके साथ एक दिलचस्प कहानी भी जुड़ी है..... कहा जाता है कि बाबर के लोगों ने कई मूर्तियां तोड़ी लेकिन वे इस मूर्ति को तोड़ने में नाकाम रहे थे।
इन मूर्तियों को निकालने के लिये चट्टान की सतह को नीचे तक काटना पड़ा था... अन्य स्थानों में पाई गईं मूर्तियों की तरह यहां प्रत्येक तीर्थंकर से जुड़े विशिष्ट प्रतीक उनके पैरों के पास दर्शाए गए हैं। तीर्थंकरों की मूर्तियों के सिर के ऊपर सुंदर छतरियां लगी हुई हैं जिन पर महीन नक़्क़ाशी की गई है।
आज ये मूर्तियां शानदार मध्ययुगीन स्थापत्य कला की गवाह के रूप में मौजूद हैं।
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