Border - Ghar kab aaoge...(Reimagined - Female version)
Автор: Lafz-e-Minipati
Загружено: 2026-01-04
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Ever imagined how a female version of the iconic "Ghar kab aaoge" would be like?
Here's our take!
Lyrics: Minipati
घर कब आओगे…
लिफ़ाफ़े में लिपटी हुई बेक़रारी
दिलों में जली हिज्र की चिंगारी ,
यूँ अश्कों से कब तक, हमें तुम रुलाओगे?
घर कब आओगे…
वो सरहद का सन्नाटा डसने लगा है,
ये तन्हाइयाँ भी अब रोज़ चीख़ती हैं,
सुकूँ दिल का आख़िर, कब लेके आओगे
घर कब आओगे...
घर कब आओगे...
सँवरती हूँ दर्पण के आगे मैं तन्हा,
नज़रों में बस एक तुम्हारा ही चेहरा
ये बिखरी सी ज़ुल्फ़ें, तुम्ही सुलझाओगे
घर कब आओगे...
घर कब आओगे...
टिकी हैं दर पे मेरी दो आँखें,
इबादत में उठते हैं मेरे हाथ
चराग़ों में उम्मीद का घी चढ़ाने
घर कब आओगे...
घर कब आओगे...
शहादत तो क़िस्मत है वीरों की लेकिन,
अभी ज़िंदगी को तुम्हारी हैं ज़रूरत
अधूरी वो बातें, कब तुम बताओगे?
घर कब आओगे...
घर कब आओगे...
बहुत हो चुका अब ये यादों का पहरा,
कि ख़ामोशियाँ भी सवाल करती हैं
हक़ीक़त में हमको गले कब लगाओगे?
घर कब आओगे…
घर कब आओगे...
घर कब आओगे...
Повторяем попытку...
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