गुरु ध्यान स्तुति | श्री विकासनाथ गुरु वंदना | Guru Dhyan in Sanskrit
Автор: Sanatana Nigudha Shastra Educational Foundation
Загружено: 2026-01-04
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Описание:
गुरुं शान्तं करुणासिन्धुं
धैर्यगाम्भीर्यसंयुतम्।
शिष्यचित्तप्रकाशार्थं
विकासनाथं भजे सदा॥
अज्ञानान्धतमोभेत्तारं
ज्ञानदीपप्रदीपकम्।
विवेकवैराग्यदातारं
विकासनाथं भजे सदा॥
न देवत्वेन संपूज्यं
न लौकिकगुणमात्रकम्।
शिवमार्गप्रदर्शार्थं
विकासनाथं भजे सदा॥
गुरुवाक्यं हि शास्त्रं स्यात्
गुरुदृष्टिर्हि पन्थनः।
यस्य कृपया बोधो जायते
विकासनाथं भजे सदा॥
यथा दीपः क्षणेनैव
नाशयत्यन्धकारकम्।
तथा गुरुकृपया नित्यं
विकासनाथं भजे सदा॥
शान्तमूर्तिं क्षमाधारं
मौनगाम्भीर्यशालिनम्।
शिष्यरक्षापरायणं
विकासनाथं भजे सदा॥
न गुरोरधिकं ज्ञानं
न गुरोरधिकं बलम्।
गुरुकृपैकसंपन्नं
विकासनाथं भजे सदा॥
एवं ध्यात्वा गुरुं नित्यं
शुद्धचित्तः समाहितः।
सर्वकर्मसमारम्भे
विकासनाथं भजे सदा॥
इदं ध्यानविधिं नित्यं
यः पठेत् श्रद्धयान्वितः।
अज्ञानतिमिरं नश्येत्
गुरुकृपाबलतो ध्रुवम्॥
यह पावन गुरु ध्यान–ज्ञान–विधि श्री विकासनाथ गुरुजी के चरणों में समर्पित एक शुद्ध गुरु-स्तवन है।
इस स्तुति में गुरु को देवता या अवतार के रूप में नहीं,
बल्कि ज्ञानमार्ग के प्रकाशक, शिष्य के चित्त को जाग्रत करने वाले और शिव-तत्त्व की ओर ले जाने वाले गुरु के रूप में नमन किया गया है।
🔸 यह ध्यान पाठ—
• गुरु कृपा की अनुभूति के लिए
• चित्त की शांति और विवेक के लिए
• साधना से पूर्व या नित्य जप हेतु
• गुरु भक्ति और गुरु स्मरण के लिए
अत्यंत उपयुक्त है।
स्तुति के प्रत्येक श्लोक के अंत में
“विकासनाथं भजे सदा॥”
गुरु-स्मरण की ध्रुव पंक्ति के रूप में रखा गया है।
📿 भाषा: संस्कृत (सरल, गायन योग्य)
📖 साथ में: हिन्दी भावार्थ
⏳ उपयुक्त अवधि: ध्यान, जप, रिकॉर्डिंग व साधना
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