शून्य से शिखर और फिर पतन: कैसे मुट्ठी भर अंग्रेजों ने भारत पर राज किया?
Автор: Pure Intellect Universe
Загружено: 2026-02-07
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यह टाइटल अपने आप में भारतीय इतिहास के सबसे दिलचस्प और जटिल अध्याय को समेटे हुए है। इसकी व्याख्या को हम तीन मुख्य चरणों में समझ सकते हैं:
1. शून्य से शुरुआत (The Humble Beginning)
अंग्रेजों की शुरुआत भारत में किसी विजेता के रूप में नहीं, बल्कि व्यापारियों के रूप में हुई थी।
ईस्ट इंडिया कंपनी (1600): शुरुआत में यह केवल मसालों और कपड़ों का व्यापार करने आई एक छोटी सी कंपनी थी।
फैक्ट्री से किले तक: मुगल बादशाहों (जैसे जहांगीर) से व्यापार की अनुमति लेकर इन्होंने सूरत और मद्रास जैसी जगहों पर 'फैक्ट्रियां' बनाईं, जो धीरे-धीरे सुरक्षा के नाम पर किलों में तब्दील हो गईं।
2. शिखर की ओर (The Rise to Power)
यह सबसे हैरान करने वाला हिस्सा है कि कैसे कुछ हजार अंग्रेजों ने करोड़ों की आबादी वाले देश पर कब्जा कर लिया। इसके पीछे कुछ मुख्य कारण थे:
बांटो और राज करो (Divide and Rule): भारत उस समय छोटे-छोटे रियासतों में बंटा था। अंग्रेजों ने एक राजा को दूसरे के खिलाफ मदद दी और बदले में उनकी जमीन और ताकत हड़प ली।
प्लासी और बक्सर का युद्ध (1757 & 1764): इन दो लड़ाइयों ने अंग्रेजों को सिर्फ व्यापारी से 'शासक' बना दिया। उन्हें बंगाल का दीवानी अधिकार (Tax वसूलने का हक) मिल गया।
आधुनिक तकनीक और कूटनीति: अंग्रेजों के पास बेहतर बंदूकें, अनुशासित सेना और 'हड़प नीति' (Doctrine of Lapse) जैसे चालाक कानून थे।
3. शिखर पर साम्राज्य (The Peak of British Raj)
1858 के बाद, भारत की कमान सीधे ब्रिटिश क्राउन (महारानी विक्टोरिया) के हाथ में आ गई।
इस दौरान उन्होंने रेलवे, टेलीग्राफ और प्रशासनिक ढांचा तो बनाया, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य भारत का आर्थिक शोषण था।
भारत 'सोन की चिड़िया' से निकलकर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन गया।
4. पतन की शुरुआत (The Fall)
साम्राज्य जितना बड़ा होता गया, उसके पतन के बीज भी उतने ही गहरे होते गए:
राष्ट्रवाद का उदय: 1857 की क्रांति ने नींव हिला दी थी, और बाद में गांधीजी, सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह जैसे नायकों ने जन-आंदोलन खड़ा कर दिया।
विश्व युद्ध का प्रभाव: दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन आर्थिक रूप से टूट चुका था। अब उनके लिए इतने बड़े और विद्रोही भारत पर नियंत्रण रखना नामुमकिन था।
आर्थिक और नैतिक हार: अंततः 15 अगस्त 1947 को वह साम्राज्य ढह गया जिसे अंग्रेज 'अजेय' मानते थे।
निष्कर्ष: यह कहानी केवल अंग्रेजों की चालाकी की नहीं, बल्कि हमारी फूट और फिर हमारी एकता की कहानी है। यह सिखाती है कि कैसे व्यापार के बहाने आई एक शक्ति, सिस्टम की कमियों का फायदा उठाकर मालिक बन सकती है।
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