जिस मुहर पर पूरा बाज़ार चलता था, वही एक दिन शक के घेरे में कैसे आ गई?
Загружено: 2026-03-18
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सोनपुर चौक में सोना नहीं… भरोसा बिकता था। और उस भरोसे की पहचान थी एक छोटी-सी मुहर — हरिदास सुनार की।
सालों की मेहनत से बनी उसकी साख इतनी मजबूत थी कि लोग सिक्के नहीं, उसकी “हाँ” खरीदते थे। एक शब्द — “ठीक है” — और सौदा तय। लेकिन एक दिन, एक छोटा-सा सवाल पूरे बाजार को हिला देता है।
जब एक सिक्का बाहर “हल्का” निकलता है… तो शक सिर्फ उस सिक्के पर नहीं रहता। उंगली उठती है उस आदमी पर, जिस पर सबकी नींव टिकी थी।
धीरे-धीरे बाजार दो हिस्सों में बंट जाता है — भरोसा करने वाले और शक करने वाले। और बीच में खड़ा हरिदास, खुद से पूछता रह जाता है — गलती सच में कहाँ हुई?
जब सच सामने आता है, तब पता चलता है… कि हर कहानी में दोषी वो नहीं होता, जिस पर सबसे पहले उंगली उठती है।
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