Pahari Natti | Maesti Sauki-Saui Bauli | Chiraag Jyoti Majta | Official Audio | Music HunterZ
Автор: Music HunterZ
Загружено: 2018-03-03
Просмотров: 54460
Описание:
Himachali Natti 2018
Album - Dastoor
Download Mp3: http://musichunterz.net/albview.php?a...
Singer - Chiraag Jyoti Majta
Music - Surender Negi
Label -Music HunterZ
Website - http://musichunterz.net
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थोड़ा समय निकालकर इस काहानी को पढ़िएगा !
इस गीत की कहानी पढ़ने से पहले इसकी थोड़ी भूमिका और साथ ही महत्त्व जानने की आवश्यकता है क्योंकि शायद हमारी पहाड़ी संस्कृति में जितने भी सतियों पर आधारित गीत एवं गाथाएं हैं ये गीत उन सभी में सर्वोपरि है जो कि समयावली , कमज़ोर प्रचार व कुच्छ एक गीतकारों और गायकों के बेढंग-बेतुके प्रस्तुतीकरण की बदौलत अपनी पहचान खोने लगा था ! हालांकि मैंने भी इस गीत की असली धुन नहीं गाई है जिसका मुझे पूर्ण ज्ञान भी है पर उसी धुन को मौलिक रूप में रखकर मैंने गीत के अर्थ को सहेजते हुए इसे इस रूप में प्रस्तुत किया है क्योंकि इसकी असली धुन शायद ‘सती’ जैसे मार्मिक विषय के साथ मेल नहीं खा रही थी व् थोड़ी तेज़ आवर्तन की थी ! आपको ये धुन ‘सती कुजी’ की तरह लग सकती है पर कूजी की सटीक धुन से भी मैं ही आपको अवगत करवाऊंगा ! इस गीत का सटीक समय बता पाना असंभव है क्योंकि मैंने भी लगभग 20 ज्ञानी बुजुर्गों को पूछ के पाया कि ये घटना शताब्दियों पुरानी है ! ये भी विडंबना ही है के जब मैंने सबसे पहले पारंपरिक गीतों को गाने के बजाए सहेजने के लिए लिखना शुरू किया था तो ये वही गीत है जो मेरी परम-पूजनीय नानी श्रीमती धनवती चांटा जी ने सबसे पहले लिखवाया था व् आज इसे गाने में समर्थ हो पाया हूँ जिसके लिए मेरी नानी व् सभी बुजुर्गों का शुक्रगुज़ार हूँ ! इसी भावना को दिल में लिए व् इस गीत को उचित सम्मान देने के लिए , मेरी भावनाओं को समझते हुए ‘मैस्ती गरिबी- नेगी पौल्सराम’ में मेरे लामण के बाद फिर से एक बार मेरे ईश्वर-तुल्य गुरु श्री #SURENDER_NEGI ने खुद ही प्रस्ताव रखा कि इस गीत की भूमिका में एक लामण की आवश्यकता है जिस बात के लिए वे बधाई के पात्र भी हैं के उनका ये शिष्य आज पारंपरिक संस्कारों को सहेजने का काम इतना बखूबी कर रहा है ! तो मौलिक तौर-तरीको-तर्ज़ को ध्यान में रखकर मैंने खुद ही एक बार फिर देवता साहिब नगेश्वर और इस घटना के पात्रों को ध्यान में रखकर इस लामण की रचना कर डाली और आशा भी है के इस प्रयास में सफल भी हुआ हूँ ! देखिये एक बार पुनः आपसे कहना चाहता हूँ कि मुझे इन गीतों से किसी भी तरह की कमाई या वाह वाही नहीं लूटनी , मैं वैसे भी खुद को एक गायक कम और कहानीकार या इतिहासकार ज़्यादा समझता हूँ ! मेरा रिश्ता ना ‘जोउटा-बढाल’ से है ना मेरे द्वारा गाये गए किसी भी गीत से और ना ही मेरा उद्देश्य किसी को ऊंचा-नीचा दिखाना या किसी की जात-पात को लेकर इशारा करना होता है , मुझे बस इन गीतों , मेरी-आपकी संस्कृति इतिहास व् इनके संस्कारों से मोह है और इस गीत के सन्दर्भ में बात करूँ तो मैं इसे इसका उचित सम्मान दिलाना चाहता हूँ तो इसी तरह के विषयों को बचाए रखने के लिए मुझे हमेशा प्रेरित करें !
कहानी –
जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूँ के ये गीत सती के विषय के मामले में सबसे सर्वोपरि है ! ऐसा इसलिए क्योंकि एक ही समय-एक ही जगह पे दो सतियाँ हमारे पहाड़ी इतिहास में कभी नहीं जली ! और इस बात का साक्षी बना गाँव झड़ग का पट्टीधार शमशानघाट ! ऐसा कहा जाता है के उस समय इस इलाके के सबसे बड़े गाँव झड़ग , करासा व बल्सा हुआ करते थे ! मेरे गाँव करासा ने खैर आज भी अपना वही रूप गाहे-बगाहे बनाए रखा हुआ है और निस्संदेह झड़ग भी आकार में काफी बड़ा है पर समय की मार देखिए एक ज़माने में 12-1500 बस्तियों वाला बल्सा आज बहुत कम रह गया है ! ये बात मैं इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि ‘सौई’ जो इस कहानी का एक मुख्य पात्र है उसके खानदान का कोई पता नहीं लग पाया ! तो ज़ाहिर है झड़ग में दैवीय प्रकोप जैसे मृत्यु या आगे वंश ही ना बढना या फिर खानदान ही ‘उगल’ जाना या प्राकृतिक प्रकोपों जैसे भू-स्खलन इत्यादि के चलते कई खानदान बर्बाद व् समाप्त हुए होंगे ! झड़ग की मूल ‘ज़ागा’ को कटेड़ा नामक स्थान कहकर संबोधित किया जाता है व क्षत्रिय समुदाय को ‘कप्राण’ जिसमे मुख्यतः बरागटा , सारटा , मेहता , सोपटा , भ्रौटा ( मूलतः कोटखाई से ) , सल्पेट , गरज़ेट आदि खानदान आते हैं और दील्टा व ढालटा भी समकक्ष चलते हैं किन्तु ये दो खानदान कपरान तो नहीं पर क्षतृय निवासी वहीँ के हैं व् ढालटा आज नकराडी-मटासा तक फैले हुए हैं तो इस गीत के पात्रों का सटीक खानदान बता पाना बेहद कठिन है ! ये कहानी सर्वोपरि सिर्फ इसलिए नहीं है कि दो सतियाँ हुई अपितु इसलिए क्योंकि ‘सौकी’ ने खुद ही अपने पति ‘सौई’ को मौत के घाट उतारा था और अपने पति-प्रेम की निष्ठा का मान रखते हुए व् अपने ज़मीर को दिखाते हुए सती हुई थी व् इस बात के लिए भी सर्वोपरि है क्योंकि शायद इसी गीत में एक सती की मार्मिकता बढे अच्छे ढंग से बताई गई है ! संक्षेप में इस गीत के तीन भाग हैं – पहला सौकी – सौई का वार्तालाप , दुसरा उनका प्यार व सौकी का ज़मीर और तीसरा सौकी का अटल निर्णय और हँसते हँसते दर्द सहने की क्षमता !
इस गीत की शुरुआत लामण से हुई है जिसमे मैंने देवता नगेशर के आशीर्वाद की कामना करते हुए कहा है कि देवता साहब मैं आपको ‘नेसर’ ( एक दुर्लभ पहाड़ी फूल जो देवताओं को ही मुख्ह्यतः चढ़ाया जाता है व् मुराल डंडा जैसी जगहों पर ही मिलता है व् इसकी खुशबु की व्याख्या वही कर सकता है जिसने इसे सूंघा हो ) व् धूप ‘बाटी’ से सुसजित करता हूँ व् सौई-मदन के साथ सौकी-पौर्जा सतियों को गाने लगा हूँ !
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